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तूलिका में विराजते हैं हिंदी के पुरखे
September 14, 2020 • प्रभुनाथ शुक्ल • साहित्य

(14 सितम्बर हिंदी दिवस पर विशेष आलेख)

हिंदी सिर्फ़ भाषा नहीँ वह भावना, कला और संस्कार भी है। हिंदी हमारी आस्था है वह आत्मा में समाहित है। हिन्दुस्थान को अगर जानना है तो हिंदी को जाने बगैर हम हिन्दुस्थान को नहीँ जान सकते हैं। वह हमारे संस्कृति और संस्कार में समाहित है। हिंदी सेवी की कतार बेहद लंबी है। कई ऐसे कलाकार हैं जो हिंदी सेवा को अपना धर्म मानते हैं। उन्होंने साहित्य सर्जना को अपना जीवन बना लिया है। हिंदी को शाश्वत और जिंदादिल बनवाने के लिए ख़ुद कलम के बजाय कूची उठा रखा है। हिंदी को वह माथे की बिंदी मानते हैं।

हिंदी की चुपचाप सेवा में लगे ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि दुनिया में हिंदी ने ख़ुद अपना मुकाम तलाशा है, उसके लिए किसी ने सार्थक प्रयास नहीँ किया है। हिंदी का उत्थान सिर्फ़ मंचों और भाषणों में हुआ है। हिंदी के साथ हमने न्याय नहीँ किया है। हिंदी ने अपना गौरवशाली इतिहास स्वयं बनाया है। लेकिन हिंदी के विकास का एक कालखंड रहा है जिसमें साहित्य सेवियों ने हिंदी को सींचा है। उनके योगदान को भुलाया नहीँ जा सकता है। तकनीकी विकास से हिंदी बेहद सबल और मज़बूत हुई है।हालांकि सरकारी स्तर पर हिंदी को सींचने का काम उतना नहीँ हुआ, जितना होना चाहिए। हिंदी का विकास सिर्फ़ फाईलों में बंद है। साहित्य पुस्तकालयों की शोभा है। 

हिन्दुस्थान बिसाल साम्राज्य है लेकिन हिंदी विभाजित है। वह पूरब- पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में बंटी है। वह राजभाषा भले बन गई हो लेकिन राष्ट्रभाषा नहीँ बन पाई। किसी ने इसे बनाने का भी प्रयास नहीँ किया। हिंदी को लेकर सिर्फ़ राजनीति होती रही। लेकिन यह राजनीति की भाषा नहीँ बन पाई। हिंदी पर वोट नहीँ मांगे गए और संसद में बहस का विषय हिंदी नहीँ बन पायी। गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी बोलने वालों को किस हिकारत से देखा जाता है यह किसी से छुपा नहीँ है। बैंक, रेल और सरकारी कार्यालयों में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए खूब मंचीयता हुई। सरकारी आदेश जारी हुए, हिंदी पखवारे का आयोजन हुआ। लेकिन हिंदी कामकाज की भाषा नहीँ बन पायी। हालांकि दुनिया के कई देशों में बोलचाल में हिंदी का प्रयोग होता है। संचार तकनीक के आने के बाद हिंदी की लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन हिंदी के विकास के लिए जिस तरह के राजनैतिक प्रयास होने चाहिए वह नहीँ हुए हैं। हिंदी को अगर आंदोलन के रूप में लिया जाता तो आज हिंदी का स्थान कुछ अलग होता।  

हिंदी के विकास में भारतीय साहित्यकारों और साहित्य चित्रकारों के योगदान हम कभी नहीँ भूल सकते हैं। आज हिंदी का जो मानसम्मान है वह उन्हीं की उपलब्धियां हैं। हिंदी को उन्होंने पालपोष कर युवा बनाया है। मोबाइल और लैपटॉप  संस्कृति ने भी हिंदी के विकास में अहम भूमिका निभाई है। हिंदी के अनगिनत शाफ्ट वेयर आए जिन्होंने हिंदी को लिखना और आसान बना दिया जिसकी वजह से हिंदी अँग्रेजी दा की भी पहली पसंद बन गई। हालांकि डिजिटल पत्रकारिता और साहित्य का उदय हुआ, लेकिन पाठकीयता के संकठ की वजह से हिंदी की नामचीन पत्रिकाएँ बंद हो गई। अखबार डिजिटल हो गए। नई पीढ़ी के लिए प्रेमचंद, निराला, महादेवी, भूषन, घनानंद, कबीर, सुर, तुलसी मीरा बेमतलब हो गए। युवा पीढ़ी का किताबों से कोई सरोकार नहीँ रह गया है। 

4 सितम्बर को हिंदी दिवस है। दुनिया भर में इसका आयोजन होगा। हिंदी के विकास की गाथा पढ़ने मंच पर लाखों लोग आएंगे और हिंदी का श्राद्ध मना बिल में घूस जाएंगे। फ़िर बेचारी हिंदी, हिंदी ही रह जाएगी। फ़िलहाल हिंदी के विकास की परिचर्चा कुछ शब्दों में हम नहीँ समेट सकते हैं। देश में ऐसे अनगिनत लोग हैं जो हिंदी की चिंता करते हैं और अपने तरीके से हिंदी की ओढ़ते, दसाते और बिछाते हैं। इसी में एक नाम है विनय कुमार दुबे का जिन्होंने अपने अनूठे प्रयास से हिंदी साहित्य की कई पीढ़ियों को अपनी तूलिका में सहेज रखा है। विनय दुबे मूलतः उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के कांशीरामपुर गाँव के रहने वाले हैं। वह सीमा शुल्क विभाग से सेवानिवृत हुए हैं। उपनिरीक्षक पद से सेवा में आने के बाद कई ऊंचाईयां हासिल किया। कला उनका विषय नहीँ था लेकिन एक घटना ने उन्हें इस तरह खींच लिया। इसके बाद कूची उठ गई तो फ़िर कभी हाथों में ठहराव नहीँ आया। अपनी लाजवाब चित्रकारी से वह हिंदी की सेवा में जुटे हैं।

विनय कुमार दुबे नोएडा और प्रयागराज में रहते हैं। कोरोना काल में वह प्रयागराज में हैं। लेकिन हिंदी का साहित्यकर्म यहाँ भी जारी है। अब तक वह 500 से अधिक तैलचित्र बना चुके हैं। जिसमें हिंदी के नामचीन और गुमनाम साहित्यकार भी हैं। कई हिंदी साहित्यकारों का कल्पना चित्र भी उन्होंने बनाया है। हिंदी साहित्य का ऐसा कोई ध्रुवतारा नहीँ होगा जिसका चित्र उन्होंने न बनाया हो। उन्होंने दूसरी भाषा के साहित्यकारों का भी चित्र बनाया है, लेकिन हिंदी के साहित्यक उनकी तूलिका के मूल विषय हैं। 

प्रयागराज के नैनी में चित्रकूट मार्ग पर डांडी नामक स्थान पर यमुना नदी के किनारे प्रेमशंकर गुप्त कलादीर्घा है जहाँ 350 से अधिक हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकारों के तैलचित्र लगे हैं। हिंदी साहित्यकारों पर इनका एलबम भी है। विनय कुमार के अनुसार चित्रकला के प्रति उनका रुझान एक घटना से जागा। बात 1987- 88 की है जब प्रयागराज के जगततारण कालेज में जयशंकर प्रसाद की जयंती मनाई जा रही थीं। उस दौरान प्रसाद जी का चित्र उपलब्ध नहीँ हो पाया। जिसके के बाद बहन के आग्रह पर उन्होंने पहला जलचित्र बनाया, यहीं से उनकी शुरुवात हुई। सालों पूर्व हिंदी सेवा का चला यह कारवां आज बिसाल बटवृक्ष बन गया है। 

विनय कुमार बताते हैं कि अब यह मेरी आदत बन गई हैं। सप्ताह में एक साहित्यकार के तैलचित्र का निर्माण करते हैं। इसके अलवा देश की सामाजिक समस्याओं पर भी बेहतरीन चित्रकारी करते हैं। कोरोना काल में उनकी कई तस्वीरें खूब सराही गई हैं। जिसमें प्रभुपाद और यमुना का चित्रांकन अहम है। उनके विचार में साहित्य का एक भाग चित्रकला है। शुरुवाती जीवन में साहित्य के लिए चित्रकला  अनिवार्य है। वह मानते हैं कि देश में हिंदू साहित्यकारों के साथ न्याय नहीँ हुआ। भूषण, छत्रसाल और जगतिक जैसे हिंदूवादी साहित्यकारों को पीछे धकेला गया। हिंदू जनमानस को भीरू बनाया गया। इसलिए हमने ऐसे उपेक्षित साहित्यकारों को अपना विषय बनाया।

देश में कला और साहित्य को पीछे धकेलने का काम किया गया है। युवाओं को लोक और कला संस्कृति से विमुख किया गया। पश्चिमी सभ्यता कि तरफ़ उन्मुख किया गया। जिसकी वजह से साहित्य और चित्रकला को लेकर आज के युवाओं में उपेक्षा है। अपनी कला, साहित्य और संस्कृति की पुनर्स्थापना के लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। कला एक अभिरुचि है। बचपन से ही खिलौनों से अधिक चित्रों से लगाव था। वहीं विषय हमें यहाँ खींच लाया। हालांकि उन्हें कई सम्मान भी मिलें हैं। लेकिन सरकार और हिंदी संस्थान की तरफ़ से अभी तक कोई सम्मान नहीँ मिला है। वह अपनी चित्रकला प्रदर्शनी का प्रदर्शन भी करते हैं। लेकिन कला, साहित्य और साहित्यकारों की उपेक्षा उन्हें खलती है। वह कहते हैं कि साधना ही सच्चा पुरस्कार है।