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श्राद्धपक्ष में छत्र और पादुका दान की महिमा
September 1, 2020 • शिखर चंद जैन • धर्म - संस्कृति

श्राद्ध कर्म में पितरों के निमित्त तथा अन्य पुण्य के अवसरों पर भी छाता और जूते का दान किया जाता है। यमलोक का मार्ग अत्यन्त कष्टप्रद है, वहां अत्यन्त ग्रीष्म की तपन है और लगातार भीष्ण वर्षा होती रहती है, मार्ग में बालू, कांटे आदि हैं। छाते से यम मार्ग में प्रेत की ग्रीष्म के ताप एंव वर्षा से रक्षा होती है। विशेष रुप से एकादशाह श्राद्ध के दिन और शय्यादान में इन दोनों का दान किया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में भी इनके दान की सनातन परम्परा है।

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने पितामह भीष्म से पूछा- हे भरत श्रेष्ठ! श्राद्धकर्म तथा अनेक पुण्य के अवसरों पर छत्र और उपानह (जूते) दान देने का जो परम्परा चली आयी है, उसे किसने चलाया तथा इसका रहस्य क्या है, बताने की कृपा करें।

इसपर भीष्म जी बोले- राजन! इन दोनों वस्तुओं की उत्पत्ति कैसे हुई और कैसे इसकी दान परम्परा चली तथा इसका क्या फल है, इस विषय में प्राचीन आख्यान है, आप ध्यान से सुनें।

पूर्वकाल की बात है, एक दिन भृगुनन्दन महर्षि जमदग्नि धनुष चलाने की क्रीड़ा कर रहे थे। वे बार-बार धनुष पर बाण रखकर चलाते और उन बाणों को उनकी धर्मपत्नी देवी रेणुका ला-लाकर उन्हें दिया करती थीं। ज्येष्ठ मास का समय था। सूर्यदेव दिन के मध्यम भाग में आ पहुचें थे। महर्षि बाण चला ही रहे थे, माता रेणुका बार-बार बाण लाकर दे रहीं थी, धूप की तपन अधिक होने से वे पेड़ों की छाया में से होकर गुजरतीं, उनके पैर और सिर धूप से जल रहे थे। उन्हें बड़ा कष्ट हो रहा था। वे कुछ समय के लिए छाया में ठहर गयीं। बाण लेकर जब ये देर से पहुंचीं तो महर्षि ने पूछा- देवि! तुम्हारे आने में इतनी देर क्यों हुईॽ इसपर उन्होंने प्रचण्ड धूप के कष्ट की बात उन्हें बता दी।

यह सुनकर महर्षि क्रुद्ध हो उठे और बोले- रेणुके! जिसने तुम्हें कष्ट पहुंचाया है, उस सूर्य को आज ही मैं अपने बाणों की अस्त्राग्निके तेजसे गिरा डालूंगा। ऐसा कहकर वे अपने दिव्य धनुष पर बहुत से बाणों को रखकर सूर्य की ओर मुंह करके खड़े हो गए। उन्हें युद्ध के लिए तैयार देख सूर्यदेव भयभीत हो ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके पास आये और बोले- ब्रह्मन्!  सूर्य ने आपका क्या अपराध किया है। सूर्यदेव तो आकाश में स्थित होकर अपनी किरणों द्वारा वसुधाका रस खींचते हैं और बरसात में पुनः उसे बरसा देते हैं, वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है और अन्न ही जीवों का प्राण है। औषधियां, लताएं, पत्र-पुष्प-ये सब भगवान सूर्य की कृपासे ही उत्पन्न होते हैं, भला सूर्य को गिराकर आपको क्या लाभ होगा! सूर्य देव के इस तरह प्रार्थना करने पर भी महर्षि का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे ब्राह्मण रूप में उपस्थित सूर्य को पहचान गए। सूर्य ब्रह्मर्षि के तेज से भयभीत हो उनके शरणागत हो गए, तब महर्षि ने कहा- शरणागत की रक्षा करना महा धर्म है, फिर भी आप अपने तेज से रक्षा का कोई समाधान सोचिये। तब भगवान सूर्य उन्हें शीघ्र ही छत्र और उपानह- ये दो वस्तुएं प्रदान कीं।

उस समय सूर्य देव ने कहा- ब्रह्मन! यह छत्र मेरी किरणों का निवारण करके मस्तक की रक्षा करेगा तथा ये जूते पैरों को जलने से बचायोंगे। आज से ये दोनों वस्तुएं जगत् में प्रचलित होंगी और पुण्यक् अवसरों पर इनका दान उत्तम तथा अक्षय होगा।

इस प्रकार छाता और जूता- इन दोनों का प्राकट्य और इन दोनों को लगाने तथा पहनने की प्रथा सूर्य ने ही जारी की है। इन वस्तुओं का दान तीनों लोकों में पवित्र माना गया है।