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सत्ता की महत्वकांक्षा में फंसी महाराष्ट्र की राजनीति
November 14, 2019 • प्रभुनाथ शुक्ल • राजनीति

महाराष्ट्र में अततः राज्यपाल की अनुशंसा के बाद राष्ट्रपति शासन लग गया। भाजपा के ना के बाद राजनीतिक पंड़ित मान रहे थे कि राज्य को राष्ट्रपति  शासन के हवाले किया जा सकता है। क्योंकि राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी शिवसेना और एनसीपी को सरकार बनाने का जो वक्त दिया था। वह पर्याप्त नहीं था। क्योंकि राज्य के हालात को देखते हुए विपरीति विचाराधारा के दलों का बगैर कामन मिनिमन प्रोग्राम के एक साथ आना आसान नहीं था। राजभवन ने जो रणनीति बनायी थी आखिरकार उसी की तरफ सधे कदम उठाए। राजभवन यह साबित करना चाहता था कि दलों को आमंत्रित करने में संविधानिक नियमों का अनुपालन करते हुए पूरी ईमानदारी बरती। लोकतंत्र के खिलाफ राजभवन की तरफ से कोई गुस्ताखी नहीं की गयी।  जबकि जमींनी सच्चाई यह थी कि यह सब दिखावा था। राजभवन सीधे केंद्र के इशारे पर काम कर रहा था। अगर ऐसा नहीँ था तो प्रधानमंत्री मोदी के ब्राजील दौरे पर जाने से पूर्व राष्ट्रपति शासन क्यों लगाया गया जबकि राजभवन से एनसीपी को रात्रि आठ बजे तक का वक्त दिया गया था। राजभवन को कम से कम निर्धारित समय का इंतजार करना चाहिए था,  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह साबित होता है कि राजभव सीधे केंद्र सरकार के इशारे पर अपने कदम बढ़ा रहा था। हालांकि विधानसभा को भंग नहीं किया गया है।  ऐसी स्थिति में राज्य में नयी सरकार के गठन विकल्प खुला है। सरकार की गेंद एक बार फिर भाजपा के हाथ जाती लगती है।
महाराष्ट्र में लोकतंत्र का खुले आम गलाघोंटा गया है। जनता के विश्वास के साथ राजनीति ने खेल किया है। राज्य में लोकतंत्र हासिए पर चला गया। सत्ता के लिए भाजपा, शिवसेना और एनसीपी के साथ कांग्रेस ने जो घिनौना खेल खेला इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है। भाजपा और शिवसेना ने अगर चुनाव पूर्व महायुति किया था तो बाद में भी इस धर्म को निभाना चाहिए था। दोनों दलों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा को खूंटी पर टांग जनादेश का सम्मान करते हुए स्थायित्व सरकार देनी चाहिए थी।  यह लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात है। शिवसेना अगर अपनी जिद पर अड़ी थी तो भाजपा को नरम रुख अख्तियार करना चाहिए था। मुख्यमंत्री पद के बंटवारे पर दोनों दलों नरम होना चाहिए था।
शिवसेना और भाजपा की सियासी दोस्ती तकरीबन 30 साल से भी अधिक पुरानी थी। लेकिन भाजपा अपनी सियासी रणनीति में लेकर शिवसेना के जिद की हवा निकाल दी है। अगर शिवसेना के पास संख्या बल नहीं था संजय राउत बार-बार सरकार बनाने
का दावा क्यों कर रहे थे। एनसीपी से समर्थन की बात जब अंतिम पड़ाव पर नहीं  पहुंची थी तो शिवसेना ने भाजपा से अपनी दोस्ती क्यों तोड़ लिया। केंद्र में अपने एक मात्र मंत्री का इस्तीफा क्यों दिलवा दिया। 
महाराष्ट्र के इस पूरे राजनीतिक घटना क्रम में कांग्रेस भी पूरी तरह जिम्मेदार है। शिवसेना के समर्थन के मसले पर कांग्रेस ने कच्चा खेल खेला है। उसने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय नहीं दिया। महाराष्ट्र में अगर उसे भाजपा को जमींनी दिखानी थी तो सारे सिद्धांत और वसूल किनारे कर शिवसेना को आंख मूंद कर समथन देना चाहिए था। उसके पास पूरा मौका था जब वह गोवा, मणिपुर, मेघालय और बिहार के साथ कर्नाटक का बदला चुका सकती थी। लेकिन उसने ऐसा न कर बड़ी भूल किया। कश्मीर में महबूबा के साथ गठबंधन कर भाजपा ने कौन सी नीति का अनुपालन किया था। फिर कांग्रेस किस सिद्धांत की बात करती है। बदलते राजनीतिक समीकरण को देखते हुए उसे अपनी विचारधारा को बदलना चाहिए।उद्धव ठाकरे सीधे सोनिया गांधी को फोन कर समर्थन की मांग की थी। लेकिन देर शाम तक कांग्रेस ने अपनी सहयोगी एनसीपी को समर्थन का पत्र नहीं सौंप सकी।

राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद सोनिया गांधी के दूत अहमद पटेल, वेणुगोपाल, खड्गे और छगन भुजबल किसी नतीजे पर अभी तक नहीं पहुंच पाए। कांग्रेस और एनसीपी किस तरह का समझौता  शिवसेना से करना चाहती हैं। क्या एनसीपी और कांग्रेस सरकार में शामिल होकर शिवसेना से 50-50 की डील करना चाहते हैं। सरकार में क्या अहम मंत्रालय चाहते हैं। आखिर इतना बिलंब क्यों किया गया। जब राज्य में एक संविधानिक सरकार की अवश्यकता थी फिर निर्णय लेने में शीघ्रता क्यों नहीं दिखाई गयी। शिवसेना राष्ट्रपति शासन के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट भी गयी है। वहां से क्या फैसला होता है यह तो बाद की बात है। लेकिन राज्य की राजनीति उलझ गयी है। मीडिया में जो खबरें आयी हैं उसके अनुसार एनसीपी अपना भी मुख्यमंत्री चाहती हैं। जबकि मंत्रालय में बराबरी की हिस्सेदारी चाहती है। कांग्रेस विधानसभा अध्यक्ष के साथ मंत्रालय में भी अपनी पूरी भागीदारी चाहती है। सोनिया गांधी की झंड़ी मिल गयी है। लेकिन अब शिवसेना क्या करती है यह वक्त बताएगा। फिलहाल विधायकों की खरीद फरोख्त को बढ़ावा मिल सकता है। अगर गैर भाजपाई दलों में सियासी  समझौता नहीं हुआ तो गेंद एक बार फिर भाजपा के हाथ जाती लगती है। अगर ऐसा होता है तो इसके लिए कांग्रेस पूरी तरह जिम्मेदार होगी।