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सामाजिक कुरीतियों पर कुठाराघात करने वाले महान संत गुरु घासीदास
December 17, 2019 • अशोक “प्रवृद्ध”

संत परंपरा में सर्वोपरि रहे भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले में अलौदाबाजार तहसील के ग्राम गिरौदपुरी  में गुरु घासीदास का जन्म 18 दिसम्बर 1756 ईस्वी को हुआ था। सत्य से साक्षात्कार करना ही जीवन का परम लक्ष्य बना चुके गुरु घासीदास के हृदय में बाल्याकाल से ही वैराग्य का भाव प्रस्फुटित हो चुका था। समाज में व्याप्त पशुबलि जातिप्रथा, छुआछुत तथा अन्य कुप्रथाओं का घासीदास बचपन से ही आजीवन विरोध करते रहे। समाज को नई दिशा प्रदान करने में इन्होने अतुलनीय योगदान दिया था। सतनाम पंथ के संस्थापक भी गुरु घासीदास को ही माना जाता है। इनके सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया। गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड़ पर समाधि लगाये। इस बीच गुरू घासीदास  ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।

समाज को एकता, भाईचारे तथा समरसता का संदेश देने वाले बाबा गुरु घासीदास के पिता का नाम मंहगू दास तथा माता का नाम अमरौतिन और उनकी धर्मपत्नी का सफुरा था। युवावस्था में घासीदास का विवाह सिरपुर की सफुरा से हुआ। भंडारपुरी आकर घासीदास सतनाम का उपदेश निरंतर देते थे। वस्तुतः बाबा घासीदास की शिक्षाएं वैदिक मत से मिलती जुलती ही थीं और सनातन धर्म की अधिकांश मान्यताएं उसमे निहित थी। मनुस्मृति में बताये गये मानव के सभी धर्म, यथा-  सत्य एवं अहिंसा, धैर्य, लगन, करूणा, सत कर्म, सरलता, व्यवहार बाबा घासीदास के नित्य की शिक्षाओं में शामिल थे। घासीदास की सत्य के प्रति अटूट आस्था के कारण ही इन्होंने बचपन में कई चमत्कार दिखाए, जिसका लोगों पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव के परिणाम स्वरूप भारी संख्या में हज़ारों-लाखों लोग उनके अनुयायी हो गए। इस प्रकार छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ की स्थापना हुई। इस संप्रदाय के लोग गुरु घासीदास को अवतारी पुरुष के रूप में मानते हैं। समाज में व्याप्त छुआछूत, ऊंचनीच, झूठ-कपट के बोलबाला के मध्य गुरु घासीदास ने समाज को एकता, भाईचारे तथा समरसता का संदेश दिया। गुरु घासीदास ने समाज के लोगों को सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने न सिर्फ सत्य की आराधना की, बल्कि समाज में नई जागृति उत्पन्न कर अपनी तपस्या से प्राप्त ज्ञान और शक्ति का उपयोग मानवता की सेवा के कार्य में किया।बाबा गुरु घासीदास ने समाज के लोगों को प्रेम और मानवता का संदेश दिया। सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित इनके सात वचन में सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेध, वर्ण भेद से परे, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना आदि शामिल हैं। इनके द्वारा दिये गये उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण की आधारशिला स्थापित करने में ये सफल हुए और छत्तीसगढ़ में इनके द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के आज भी लाखों अनुयायी हैं। संत गुरु घासीदास ने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का बचपन से ही विरोध करते हुए समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना के विरुद्ध 'मनखे-मनखे एक समान' का संदेश दिया। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ राज्य में गुरु घासीदास की जयंती 18 दिसंबर से माह भर व्यापक उत्सव के रूप में समूचे राज्य में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस उपलक्ष्य में गाँव-गाँव में मड़ई-मेले का आयोजन होता है। आधुनिक युग के सशक्त क्रान्तिदर्शी गुरु गुरु घासीदास का जीवन-दर्शन युगों तक मानवता का संदेश देता रहेगा। इनके व्यक्तित्व के प्रकाश स्तंभ से सत्य, अहिंसा, करुणा तथा जीवन का ध्येय उदात्त रुप से प्रकट होता है। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना एवं सामाजिक न्याय के क्षेत्र में 'गुरु घासीदास सम्मान' स्थापित किया है। गुरु घासीदास के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया है ।

समाज को नई दिशा प्रदान करने में अतुलनीय योगदान देने वाले सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास के सम्बन्ध में मान्यता है कि बाबा घासीदास को ज्ञान की प्राप्ति छतीस गढ के रायगढ़ जिला के सारंगढ़ तहसील में वर्तमान बिलासपुर मार्ग में स्थित एक पेड़ के नीचे तपस्या करते समय प्राप्त हुआ था।  वहाँ पर ही वर्तमान में गुरु घासीदास पुष्प वाटिका की स्थापना की गयी है। गुरू घासीदास बाबा ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को न सिर्फ विरोध कर नकारा बल्कि उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभाव को नकारते हुए कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का भी विरोध किया। उनकी मान्यता के अनुसार समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हस्ती व अधिकार रखता है। गुरू घासीदास ने मूर्ति पूजा को वर्जित किया। उनका मानना था कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है। पशुप्रेमी गुरू घासीदास पशुओं से प्रेम करने की सदैव शिक्षा देते थे, और वे पशुओं पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के घोर विरोधी थे। यही कारण है कि सतनाम पंथ में कृषि कार्य हेतु गौ अर्थात गायों का इस्तेमाल सर्वथा वर्जित माना जाता है और आज भी सतनामी समाज में इनका उपयोग खेती के कार्य में नहीं किया जाता है। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में व्यापक और गहरा पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस समय लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है। गुरु घासीदास ने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ राज्य के लोगों के लिए सतनाम का प्रचार किया। घासीदास के बाद, उनकी शिक्षाओं को उनके पुत्र बालकदास ने लोगों तक पहुँचाया।  गुरु घासीदास का समाज में एक नई सोच और विचार उत्पन्न करने के बहुत बड़ा हाथ है। घासीदास जी बहुत कम उम्र से पशुओं की बलि, अन्य कुप्रथाओं जैसे जाती भेद-भाव, छुआ-छात के पूर्ण रूप से खिलाफ थे। उन्होंने सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के हर स्थान की यात्रा की और इसका हल निकालने का पूरा प्रयास किया।उन्होंने सत्य से लोगों को साक्षात्कार कराया और सतनाम का प्रचार किया। उनके अनमोल विचार और सकारात्मक सोच, हिन्दू और बौद्ध विचार धाराओं से मिलते जुलते हैं। उन्होंने सत्य के प्रतिक के रूप में 'जैतखाम' को दर्शाया – यह एक सफ़ेद रंग से रंगे लकड़ियों के  ढेर के ऊपर एक सफ़ेद झंडा लहराता स्थल होता है। इसके सफ़ेद रंग को सत्य का प्रतीक माना जाता है। गुरू घासीदास की मृत्यु तिथि अज्ञात है। मान्यता है कि सन 1756 ईस्वी में अचानक किसी दिन वे अंतर्ध्यान हो गये और फिर वे कभी दिखाई नहीं दिए। इसी लिए उनकी अंतर्ध्यान अथवा मृत्यु तिथि अज्ञात मानी जाती है।

सतनाम मत अर्थात सतनाम साधुओं के सम्बन्ध में प्रचलित कथा के अनुसार सन 1652 ईस्वी की बात है, वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सतनामी साध मत के अनुसार उनके अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकते थे और इस सिद्धांत पर अडिग रहने वाले थे। किसी का वे सम्मान तो करते थे लेकिन किसी के सामने झुक नहीं सकते थे। एक बार एक किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान समझते हुए उस पर लाठी से प्रहार कर दिया। जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी साध ने भी उस कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न हुआ और तूल पकडते हुए मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है और उसके कारिंदे को उन्होंने जमकर धुलाई की है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से नित्य मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में यह बात भी फैल गई कि सतनामी समूह कोई जादू टोना जानते हैं, जिसे आजमाकर कर वे शाही फौज को हरा रहे हैं। इस के प्रतिकार स्वरूप औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखी कागज तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ा था। उन्हें यह पता नहीं था कि सतनामी साधुओं के पास एकत्रित आध्यात्मिक शक्ति के कारण यह स्थिति उत्पन्न हो रही थी। कहा जाता है कि  सतनामी साधुओं का तप का समय पूरा हो गया था और वे गुरू के समक्ष अपना समर्पण कर वीरगति को प्राप्त हुए। जिन लोगों का तप पूरा नहीं हुआ था वे अपनी जान बचा कर अलग- अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास का भी एक परिवार शामिल था, जो महानदी के किनारे- किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुंचा था। वहीं पर संत घासीदास का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार - प्रसार किया।