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नई शिक्षा नीति से नवयुग के भारत का निर्माण: कुछ उम्मीदें, कुछ उमंगें और कुछ आशंकाएं
August 10, 2020 • डॉ यूसुफ़ अख़्तर* • शिक्षा

पिछले हफ्ते देश में नयी शिक्षा नीति की घोषणा कर दी गयी है। काफी कोशिश करने पर भी पूरा डॉक्यूमेंट नहीं मिल पा रहा था। शुरुवात में तो ये मिनिस्ट्री की वेबसाइट पर भी उपलब्ध नहीं था, फिर अंततः ये वेबसाइट पर डाला गया। अब मन मस्तिष्क में ये प्रश्न उठता है ये कैसी पालिसी है, इसमें क्या गलत है और क्या सही है। सबसे पहली बात तो ये है की कि ये पॉलिसी है क्या? क्या आवश्यकता है जिसके लिए किसी देश में एजुकेशन पॉलिसी बनाई जाती है ? ये कोई लीगल डॉक्यूमेंट नहीं है। न ही ये कोई रेगुलेशन या रूल्स है, इसलिए इस पॉलिसी में जो लिखा है उसे कल ही कोई लागू नहीं करने वाला है। ये एक फ्रेम वर्क भर है । कुछ फंडामेंटल बातें हैं, जो बताई गयीं हैं, जिन पर भविष्य में सरकारों द्वारा कानून बनाये जाने चाहिए। ये डॉक्यूमेंट देश में  हर पंद्रह-बीस साल बाद बनाया जाता है । पहली बार ऐसा डॉक्यूमेंट नेशनल एजुकेशन कमिशन जिसने १९६४ से १९६६ तक काम किया था, उसने बनाया था।  इसी कमीशन ने भारत की पहली एजुकेशन पालिसी १९६८ में प्रस्तुत की थी। उस कमीशन की अध्यक्षता  मशहूर शिक्षाविद दौलत सिंह कोठारी, जो की उस समय के युजीसी के अध्ध्यक्ष भी थे, उन्होंने की थी, और इसी वजह से इसे कोठारी कमीशन भी कहते हैं। इस एजुकेशन पॉलिसी, जिसने ओवरऑल फ्रेम दिया कि देश में शिक्षा के उद्देश्य क्या होने चाहिए प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक और सेकेंडरी शिक्षा कैसी होनी चाहिए। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में शिक्षा का प्रतिपादन कैसा होना चाहिए, कुल मिलकर छोटे-छोटे भागों में नहीं सभी टुकड़ों को जोड़ते हुए पूरे देश के शैक्षणिक ढाँचे की एक समग्र तस्वीर बनाना, यही काम होता है एजुकेशन पॉलिसी का।  उसके बाद लगभग २० साल बाद नई कमिटी ने उस पॉलिसी को रिवाइज किया था और नई पॉलिसी बनाई गयी थी। इस नए रिवाइज्ड पालिसी को तब न्यू एजुकेशन पॉलिसी बोला गया उस समय राजीव गांधी की सरकार थी।  फिर दोबारा १९९२ में उसको थोड़ा और रिवाइज किया गया था । १९९२ के बाद अब ये पॉलिसी, न्यू एजुकेशन पालिसी-२०२० आई है, जबसे २०१४ में एनडीए की सरकार आई है तभी से इसकी कोशिश शुरू की गयी थी, पहले जब स्मृति ईरानी जी मंत्री थी उन्होंने एक समिति बनाई थी जिसकी अध्यक्षता टी एस आर सुब्रमण्यम जी के की थी, उस समिति ने जून, २०१६ में अपनी रिपोर्ट दी थी लेकिन शायद सरकार को पसंद नहीं आयी। उसमें बात नहीं बनी तो उसके बाद एक दूसरी कमेटी बनाई गयी थी जून, २०१७ में, इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन जी की अध्यक्षता में, उसने पिछले साल (२०१९) जून  में अपनी रिपोर्ट सम्मिलित की थी । २०१९ में रिपोर्ट पर चर्चा हुई और उसके बाद अब सरकार इस रिपोर्ट के आधार न्यु एजुकेशन पालिसी जारी की गयी है। ये कोई चार सौ अस्सी पेज की रिपोर्ट थी । इसी लम्बी रिपोर्ट का सार जो ६० पेजों की एक समरी बनाई गयी है, उसे ही सरकार ने कल नई एजुकेशन पॉलिसी की तरह रिलीज किया है। अब ये जो ६० पेजों का दस्तावेज है उसे ध्यान से पढ़ने पर हमें पता चलता है की न्यू एजुकेशन पॉलिसी में क्या है, और क्या अच्छा है, और क्या-क्या और अच्छा हो सकता था।  किसी भी पॉलिसी का मूल्यांकन करते समय और किसी भी विषय पर अपना मत बनाते वक़्त हमें केवल और केवल उस विषय पर ध्यान नहीं देना चाहिए, जैसे इस परिपेक्ष्य में हमारे देश की शिक्षा नीति इसके केंद्र में है।  इस बात से कि ये किस सरकार के द्वारा पेश किया गया है, और हमें इसके पक्ष में रहना चाहिए या विपक्ष में, इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है। बल्कि उस विषय पर फोकस रहकर एक पेशेवर रवैय्या अपनाना चाहिए जिससे हम सही और गलत का फैसला ईमानदारी से कर सकें। हमारे देश में ये फैशन बन गया है की, विपक्ष का मतलब केवल विरोध है। लोगों को ये बोलते हुए देखा जा सकता है की,अच्छा मोदी सरकार ने इस पालिसी को लाया है तो इसका विरोध करना ज़रूरी है, पसंद की सरकार ने बताया तो समर्थन करने से हमारे देश विकास हो जायेगा। हमें  हमेशा, वस्तुपरक तरीके से किसी भी पालिसी का अध्यन करना पड़ता है, तभी हम सही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं।  हम संक्षिप्त में यहाँ देखेंगे, की न्यू एजुकेशन पालिसी में क्या है, क्या अच्छा है और क्या बुरा है।  जैसा ऊपर बताया गया है की ये पालिसी बस एक एजुकेशन फ्रेम है । इसके आधार पे जब कानून बनेगा और लागू होगा, रेगुलेशन और रूल्स बदले जायेंगे और जब नया बजट आएगा और पैसा भी मिलेगा इन रूल्स/रेगुलेशन को लागू करने के लिए, तभी से इसके आधार पे कोई निष्कर्ष निकला जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश इस देश का पुराना इतिहास ये रहा है कि एजुकेशन पॉलिसी आती तो है लेकिन उसके बाद सरकार अपने मनमाने तरीके से उसके जो हिस्से लागू करना चाहती है कर देती है जिसको लागू नहीं करना चाहती उसे नहीं करती है। क्योंकि एजुकेशन पॉलिसी का कोई लीगल स्टेटस नहीं है। सरकारें चाहे तो अगले १० साल तक इस डॉक्यूमेंट को ठन्डे बास्ते में डाल के रख सकती है, कुल मिलकर सर्कार इसके सभी बिंदुओं को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है। ये कोई कानून या रेगुलेशन नहीं है और न ही इसे नोटिफाई किया जाता है। ये एक प्रपोजल या बजट की तरह होता है। जब भाजपा जैसी राजनैतिक पार्टी द्वारा संचालित सरकार ऐसा कोई शैक्षणिक डॉक्यूमेंट लाती है तो लोगों के मन में कुछ संशय हो सकते हैं :

नयी एजुकेशन पालिसी को लेकर होने वाले आशंकाएं और उनका निवारण:

क्या ये भगवाकरण करने का प्रयत्न तो नहीं, मतलब पूरी शिक्षा का फ्लेवर हिंदुत्व-वादी तो नहीं कर देंगे? या कहीं ये बहुत अवैज्ञानिक बातें जैसे अन्धविश्वास  इत्यादि को बढ़ावा देने वाली चीज़ें पाठ्यक्रम में  तो कहीं घुसा देंगे ? लेकिन न्यू एजुकेशन पालिसी-२०२० के डॉक्यूमेंट को पढ़कर ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता है। इसमें कुछ छोटी बातों जैसे, सेकुलरिज्म और सोशलिज्म शब्द के इस्तेमाल से गुरेज़ किया है, और डॉक्यूमेंट लिखने वालों इनके प्रयोग से बचने की कोशिश की है। बीच-बीच में कई स्थानों पर, भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की बहुत बार बात की गयी है, जो की अच्छी बात है। दूसरा संशय लोगों के मन में था की कहीं राज्यों की भूमिका है को कम न किया गया हो, एक और संशय यह हो सकता है, की इसमें शिक्षा का सम्पूर्ण  प्राइवेटाईज़ेशन और कमर्शिलाइजीशान न कर दिया गया हो। ये सब चीजें ज्यादा हो जाएगी उसका बहुत लोगों को डर था लेकिन इस पॉलिसी में कहा गया कि और भी ज्यादा पैसा सरकार को खर्च करना चाहिए, ये एक स्वागत योग्य बात है। सरकारी अनुदानों के बिना स्कूल नहीं चल सकते हैं। इन सब बातों को स्वीकार किया गया है जो बहुत अच्छी बात है । तीसरा जो संशय हो सकता था वो ये है कि शिक्षा का स्कोप बहुत संकीर्ण कर दिया जायेगा और ये सिर्फ तकनीतकी शिक्षा तक सीमित रह जायेगा,  माने हर किसी को इंजीनियर बनाओ और नौकरी लो, और शिक्षा का जो क्रिटिकल थिंकिंग और लिबरल प्रारूप है वो कहीं दफ़न कर दिया जायेगा।  शिक्षा का मूल उद्देश्य ही छात्रों को एक बेहतर इंसान बनाना होना चाहिए, वो सब हटा दिया जाएगा । ध्यान से पढ़ने पर इस डॉक्यूमेंट में तो  वैसा कुछ नहीं दीखता है । अब ये बात अलग है कि डॉक्यूमेंट में न बोला जाये पर जो कानून बनाया जाये वहां वैसा ही किया जाये जैसी लोगों को शंका थी। ये अच्छी बात है कि यह डॉक्यूमेंट इससे पहले जितने भी डॉक्यूमेंट आए थे, चाहे वो यूपीए की सरकार में, या कांग्रेस के जमाने में या जनता पार्टी की सर्कार के टाइम में उन सब में दी गयी बातों को आधार बना कर ही नई पालिसी का निर्माण करता करता दिखता है। और सही मायने में ऐसा ही होना चाहिए। अब आतें हैं इस डॉक्यूमेंट की मुख्य बातों पर।

न्यू एजुकेशन पालिसी-२०२० के मुख्य बिंदु:

  1. ये पालिसी कहती है कि, राइट टू एजुकेशन (RTE) जो की २००९ में बना था उसका विस्तार होना चाहिए । इसमें ६ से १४ साल तक के बच्चो की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की बात कही गयी थी। अब उसको बढ़ा के ये नया डॉक्युमेंट कहता है की इसे ३ से १८ वर्ष तक के बच्चों पर अनिवार्य कर देना चाहीये अगर इसे कर दिया जाय तो ये शानदार बात होगी।
  2. अगली अहम् बात यह डॉक्यूमेंट कहता है कि मिड-डे मील स्कीम के साथ साथ बच्चों को ब्रेकफस्ट भी देना चाहिए । स्कूल में बच्चे बेहतर खाएंगे तो पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देंगे, और दुनिया भर में कई सारे शोध इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं की, मनुष्यों में मस्तिष्क का अधिलक्तम विकास काम उम्र में ही होता है और सुबह का पौष्टिक भोजन (ब्रेकफास्ट) मस्तिष्क के बेहतर विकास में बहुत मददगार साबित हो सकता है। ये इस पालिसी का एक बढियाँ का पॉइंट है।
  3. ये डॉक्यूमेंट कहता है कि छात्रों के ड्रॉपआउट रेशिओ को कम करना चाहिए। आज के दिन देश में अगर सौ बच्चे पहली क्लास में एडमिशन लेते हैं तो आगे की कक्षाओं तक जाकर सिर्फ ४० बच्चे ही बचते हैं बाकि के ६० विभिन्न कारणों से ड्रॉपआउट हो जाते हैं । ये डॉक्यूमेंट कहता है कि उन बच्चों को हमें ड्रॉपआउट होने से बचाना होगा और उनको आगे की कक्षाओं तक लाना होगा, और अगले १० सालों में ये लक्ष्य होना चाहिए की सौ परसेंट बच्चों को हम सेकेंडरी तक ले कर आ सकें। ये बहुत ही अच्छा प्रस्ताव है, इसमें जितनी भी सफलता मिल पाए, वो बेहतरीन होगा ।
  4. इसके बाद ये डॉक्यूमेंट कहता है की अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन (ECCE) पर बहुत ध्यान देने की ज़रुरत है । इसको नर्सरी कक्षा भी कहते हैं, जैसा ऊपर भी बताया गया है, बच्चों का ज्यादातर मानसिक विकास ८ साल की उम्र तक हो जाता है और तीन से पांच साल का जब बच्चा होता है वो बहुत महत्वपूर्ण समय होता उस बच्चे के मानसिक विकास के लिए, जबकी भारत के गांव में तो बच्चे ज़्यादातर ४-५  साल में ही स्कूल में पढ़ना शुरू करते है। उनके बारे में ये डॉक्यूमेंट कहता है की ३ साल की उम्र से ऊपर पढ़ाई करवाना अनिवार्य होना चाहिए। चाहे आंगनबाड़ी व्यवस्था के ज़रिये कराया जाये, या प्राइमरी स्कूल के अंदर ही नर्सरी शुरू करी जाए।  हर बच्चे को शिक्षा मिलनी चाहिए और सरकार को अपने  साधन इस उद्देश्य पर लगाने चाहिए। ये इस दस्तावेज के सबसे अच्छे पॉइंट्स में से एक है।  ECCE के बारे में 2013 में यूपीऐ सरकार के समय में ही नीति बनी थी, जिसको इस दस्तावेज़ ने स्वीकार कर लिया बल्कि उसे और आगे विस्तार दिया गया है  । ये अच्छी बात है।
  5. अगली बात ये पालिसी कहती है कि, हर स्कूल में सभी बच्चों को बराबर अवसर मिलने चाहिए, महिलाओं, दलित, आदिवासी और गरीब बच्चों को सभी को। लेकिन इस डॉक्यूमेंट में उसके बारे में क्या करना चाहिए, कितना पैसा दिया जायेगा इसके बारे में कुछ खास बात नहीं मिलती है ।
  6. ये फिर कहता है की स्कूलों के क्लस्टर बनाये जाएँ, आस-पास के प्राथमिक, माध्यमिक और सेकेंडरी स्कूलों की कुछ फैसिलिटीज को पूल कर दिया जाये और कुछ किलोमीटर की परिधि में स्थित स्कूलों को पूल करके सुविधाओं को साझा किया जाय। हर एक स्कूल के लिए अपना म्यूजिक टीचर रखना अपना फिजिकल ट्रेनिंग का टीचर रखना, अपनी लायब्रेरी रखना असंभव है, तो कुछ स्कूलों को उसके आस पास स्थित प्राइमरी,  माध्यमिक और सेकेंडरी स्कूलों से जोड़ कर इन बताई गयी फैसिलिटीज़ को साझा कर सकते हैं, संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए ये एक बहुत उततम विचार है ।
  7. टीचरों की भर्ती के समय एक फेयर रिक्रूटमेंट पालिसी होनी चाहिए । पैरा-टीचर्स , टेम्पररी या कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स , या शिक्षा मित्र जैसे पदों को समाप्त कर देना चाहिए । कुछ समय पहले जस्टिस जेएस वर्मा कमिटी ने भी इसको बंद करने की सिफारिश की थी। शिक्षा की गुणवक्ता बढ़ने के लिए ये बेहतर सुझाव है । शिक्षा मित्र / गेस्ट टीचर, ये सब बंद करना चाहिए और प्रोपर पक्की नौकरियों का प्रावधान किया जाना चाहिए।  जब पक्की नौकरी नहीं होती है तो उन्हें पूरी तनख्वाह नहीं मिलती है और वो ठीक से पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं ।
  8. अगली बात ये कहता है कि शिक्षा में डायरेक्ट्रेट ऑफ एजुकेशन का जो साम्राज्य है वो खत्म करके शिक्षा का बोर्ड अलग हो, सरकारी स्कूलों की फंडिंग कोई और करे और स्कूलों के रेगुलेशन का काम कोई और तीसरी एजेंसी करे । ये भी व्यवस्था सिस्टम को सुधारने में मदद कर सकती है।
  9. अगली बात ये डॉक्यूमेंट कहता है कि बच्चे को पहली से पांचवीं क्लास तक में अपनी मातृभाषा या घर में जो भाषा बोली जाती है उसी माद्यम में शिक्षा दी जानी चाहिए । मजे की बात ये कि इसमें कुछ भी नया नहीं है। देश की हर पुरानी पॉलिसी में भी ये बात कही गयी है । पिछले ५० सालों में आयी इस नयी नीति के साथ-साथ तीनो शिक्षा नीतियों ने सभी ने इस बात को दोहराया है और इसके अलावा एक थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला की बात भी हुई थी, जिसमें हिंदी, अंग्रेज़ी और एक क्षेत्रीय भाषा को एक विषय की तरह पढ़ाने का प्रावधान है । हालाँकि टी वी चैनल वाले इस पर बवाल काटे हुए हैं लेकिन इसमें कोई भी बुराई नहीं है। इंग्लिश लर्न करना और इंग्लिश मीडियम में पढ़ना दोनों अलग-अलग बातें हैं।  ये सच है की हर बच्चे को इंग्लिश लर्न करना जरूरी है । लेकिन हर बच्चे को उसकी शुरुवाती स्कूली शिक्षा में इंग्लिश मीडियम में पढ़ना कोई ज़रूरी नहीं है।
  10. ये पालिसी हायर एजुकेशन के बारे में क्या कहती है, ये कहती है  कि ये जो सिंगल डिसिप्लीन यूनिवर्सिटीज बन रही हैं जैसे आम तौर पर प्राइवेट डेंटल कॉलेज,  मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और मैनेजमेंट को इकट्ठा करके एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी बना लेते हैं, ये बिल्कुल गलत सिस्टम है । मल्टी डिसिप्लिनरी यूनिवर्सिटीज बननी चाहिए, जिसमे सभी बेसिक और एप्लाइड विषयों के डिपार्टमेंट्स स्थापित किये जाएँ । ये बहुत अच्छी रिकमेंडेशन है।
  11. हायर एजुकेशन के लिए एक और बात कही गयी है की अभी तक यूजीसी विश्विद्यालयों को ग्रांट भी देती है, वही विश्विद्यालयों के लिए नियम भी बनाती है, एक्रेडिटेशन भी करती है । यहाँ तक की वही यूजीसी यूनिवर्सिटीज/ कॉलेजों के करिकुलम को भी बताती है । अब इस नयी एजुकेशन पालिसी में इन कामों के लिए अलग अलग एजेंसियां बनाने की सिफारिश की गयी है। ये सुझाव इससे पहले भी मरहूम प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता वाली कमेटी दे चुकी है। अच्छा सुझाव है इसको मान लेना चाहिए ।
  12. आखिर दो बातें और ये कहती हैं कि शिक्षा के रेगुलेशन के लिए एक कमेटी बनाई जानी चाहिए, इसका नाम राष्ट्रीय शिक्षा आयोग होगा, देश भर के हर राज्यों का एक प्रतिनिधि हो और ३० बड़े शिक्षाविद हों और देश का शिक्षा मंत्री उसका अध्यक्ष होगा। पहले ड्राफ्ट पालिसी में प्रधानमंत्री को इसका अध्यक्ष बनाया गया था, जो सही नहीं लगता था। अब शिक्षा मंत्री को इसका नेतृत्व दिया गया है।  वैसे इससे भी और बेहतर तो तब रहता जब जीएसटी काउंसिल की तरह इसमें भी तमाम राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को भी लिया जाता।
  13. आखरी सुझाव है शिक्षा के बारे में पैसे खर्च करने का, ये पालिसी कहती है कि सरकार को कम से कम जीडीपी का ६% शिक्षा पर व्यय करना चाहिए । ये पालिसी फिर कहती है कि सरकार के खर्चे का कम से कम २०% शिक्षा पर लगाना चाहिए आजकल १०-१५ % ही खर्च होता है  तो ये बेहतरीन सुझाव हैं।      

इस पालिसी को सम्पूर्ण रूप से लागू करने पर कुछ ऐसा हो सकता है, जिससे थोड़ा बहुत नुकसान पहुँच सकता है,  पहला खतरा ये है कि RTE एक्ट को इसमें थोड़ा डायलुट किया जा रहा है, क्योंकि इस पालिसी में जो सुझाव हैं उससे लगता है कि 2009  में RTE के लिए जो स्टैंडर्ड सेट किये गए थे जैसे कि हर स्कूल में कम से कम इतना स्पेस होना चाहिए क्लासरूम ऐसे होने चाहिए, ये सुविधाएं होनी चाहिए इत्यादि, इसको डायलुट किया जायेगा। इस नीति में कहीं कहीं पर थोड़ा विरोधाभास ये दिखता है, कि एक तरफ इंस्टिट्यूशन और ऑटोनॉमी की वकालत होती है, जबकी दूसरी तरफ अभी जो व्यवस्था लागू है, उसमे यूनिवर्सिटी के अंदर आप सेमिनार भी करेंगे या नहीं उसके लिए वाइसचांसलर से परमीशन लेनी होती है। एक तरफ साइंटिफिक टेम्पर की वकालत की जाती है और दूसरी ओर देश की सरकार के मंत्री ऐसे भाषण देते हैं जिनमे अन्धविश्वास और कपोल-कल्पित बातों को प्रोत्साहन दिया जाता है। ओवरआल इस नयी शिक्षा नीति के शब्द तो बहुत अच्छे हैं,  बशर्ते इसे वास्तव में लागू किया जाए । अगर इसकी भावना को सरकार अपने मन के अंदर ले के आए और  इसके आधार पर सम्पूर्ण शैक्षणिक ढाँचे का मूल-चूल परिवर्तन की नीयत के साथ काम करे। सिर्फ शब्दों से काम नहीं चलेगा, इसको लागु करने के काम पर ध्यान दिया जाना चाहिए,  हम देखेंगे,  RTE एक्ट में संशोधन होता है कि नहीं,  हम ये भी देखेंगे कि ३ वर्ष से लेकर १८ वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान जोड़ा जाता है कि नहीं, शिक्षा के लिए अनुदान को बढ़ाया जाता है कि नहीं । हमें ये भी देखना होगा की अंत में नियमों में बदलाव करने के बाद सरकार इस बजट को खर्च करने में कामयाब हो पाती है कि नही।

*लेखक बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्विद्यालय (केंद्रीय विश्विद्यालय), लखनऊ, में बायोटेक्नोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं (सम्पर्क सूत्र: yusuf.akhter@gmail.com)