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मंडी हाउस से खिसक कर कविता गाजियाबाद आ गई : प्रेमपाल
December 2, 2019 • सजग ब्यूरो • साहित्य
अमर भारती के काव्योत्सव में देश के शीर्ष कवियों ने किया काव्यपाठ
गाजियाबाद। प्रख्यात लेखक एवं कवि प्रेमपाल शर्मा ने अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के काव्य उत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन की शुरुआत कविता से ही होती है। "काव्योत्सव" की सराहना करते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष श्री शर्मा ने कहा कि मंडी हाउस व आईटीओ (दिल्ली) से खिसक कर कविता इस मंच पर आ विराजी है। यहां सुनी पढ़ी गई कविता समझ में आती है। उन्होंने कहा कि जिस साम्राज्य में सूरज नहीं डूबता था उस राज के खिलाफ मोहनदास करमचंद गांधी खड़े हुए थे, लेकिन अंग्रेजी परस्त लोग आज भी अपना नाम डी.के. गुप्ता, एम.एल. शर्मा लिख रहे हैं। देवेंद्र कुमार गुप्ता या मक्खन लाल शर्मा लिखने में उन्हें शर्म आती है, वहीं प्रख्यात लेखक से.रा. यात्री को पूरा देश इसी नाम से जानता है। उन्हें कभी एस.आर. यात्री कहलवाने की जरूरत नहीं पड़ी। श्री शर्मा ने कहा कि हिंदी का रचनाकार आडंबरी है। ऐसे लोगों की वजह से ही हिंदी साहित्य और समाज का विनाश हो रहा है। उन्होंने "आदमी को तलाशते हुए", "नया मकान" और "आदर्श और अनुभव" शीर्षक से तीन कविताएं भी पढी।
सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित काव्योत्सव को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि विवेक गौतम ने कहा कि ऐसे आयोजन साहित्य को समृद्ध करने में बड़ा योगदान दे रहे हैं। उन्होंने "छत" और "मेरे शहर की नदी" शीर्षक से मार्मिक कविताएं भी प्रस्तुत कीं। डॉ. माला कपूर ने "छज्जा" कविता में कहा "इस चार बालिश्त के छज्जे से देखा बहुत कुछ... इस झूले पर,कुछ कविताएँ 
झूलती झुलाती, कुछ बहती बरसती,
कुछ उछलती कुछ कुलबुलाती 
तड़पती सी, कुछ उड़ती सी, शायद कूद गईं, बीसवें माले से, कुछ लपक ली गईं, कुछ ने ख़ुदकुशी कर ली...।" मनु लक्ष्मी मिश्रा ने फरमाया " तीनों इक्कों के बल पर यदि, तुम चाल चलो तो क्या चलना, दुग्गी, तिग्गी, पंजी से ही, जीतो बाज़ी तो क्या कहना?" नेहा वैद ने अपने गीत "मत इतना घबराया कर तू, दुख से आंख मिलाया कर, क्यों तू इतना व्याकुल पगले, मुश्किल से टकराया कर" पर जमकर वाहवाही बटोरी। अजय अज्ञात ने कहा "सहरा ए जिस्त में कुछ रोज तमाशे करके, चल दिए जिस्म को मिट्टी के हवाले करके।" सीताराम अग्रवाल ने शेर " दरिया तो चूमा करता है उनको भी, अपने अपने मैल जो जिसमें धोते हैं" पर भरपूर दाद बटोरी, तो सुरेंद्र सिंघल का शेर "एक पगडंडी जो आंखों में बिछी है अब तक, आज उस पर भी लपकी हैं शहर की सड़कें" भी खूब सराहा गया। मौजूदा हालात को बयां करते हुए संस्था के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने फरमाया "इस कदर तीरगी फैली है जमीन पर यारों, चांद जो छत से उतर आए काला हो जाए।" डॉ. धनंजय सिंह ने अपने गीत की पंक्तियों "यद्यपि है स्वीकार निमंत्रण, तथापि अभी मैं आ ना सकूंगा, फूल बनूं खिल कर मुरझाऊं, मेरे बस का काम नहीं है, जिससे आगे पड़े ना चलना, ऐसा कोई धाम नहीं है" पर सराहना बटोरी। काव्योत्सव का शुभारंभ आशीष मित्तल की सरस्वती वंदना से हुआ। योगेंद्र दत्त शर्मा, डॉ. वीना मित्तल, तारा गुप्ता, कमलेश फर्रुखाबादी, तरुणा मिश्रा, आलोक  यात्री, प्रवीण कुमार, सरवर हसन सरवर, मासूम गाजियाबादी, सुभाष चंदर, कीर्ति रतन, इंद्रजीत सुकुमार,  मित्र गाजियाबादी, गुरबख्श सिंह, ममता राठौर, मंजू कौशिक, सुप्रिया सिंह, तूलिका सेठ, वी.के. मेहरोत्रा, मान सिंह बघेल, जगदीश पंकज, सहित कई अन्य  रचनाकारों की कविताएं भी सराही गईं। काव्य उत्सव की विशेषता यह रही कि सिल्वर लाइन स्कूल की छात्रा नीरजांशी ने स्वरचित कविता "हिंदी मेरी भाषा" का पाठ किया। संतोष ओबरॉय, अंशू आहूजा, सुभाष अखिल, सुशील शर्मा, कुलदीप, टी.पी. चौबे सहित कई गणमान्य लोग मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन आर.के. भदौरिया ने किया।