ALL व्यापार राजनीति स्वास्थ्य साहित्य मनोरंजन कृषि दिल्ली शिक्षा राज्य धर्म - संस्कृति
मां का साया बनाम कोरोना
April 7, 2020 • -सत पाल

कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव की चर्चा सारे संसार में है और इसको लेकर सबके दिलो दिमाग में डर समाया है । लोग एक दूसरे से मिलने से कतराते हैं और नहीं मिलने के बहाने तलाशते हैं। सार्वजनिक परिवहन, दफ्तर, स्कूल , कॉलेज और बाजार बंद हैं क्योंकि पूरे देश में पूर्णबंदी है। एसे में कुछ ऐसी खबरें भी मिलती हैं जिन्हें पढ़, सुन और देख कर हैरानी होती है। नयी दिल्ली के एम्स में एक ऐसे शिशु का जन्म हुआ है जिसके माता पिता, बहन और परिवार के अन्य सदस्य संक्रमित हैं और उन्हें अलग थलग रखा गया है।  शिशु के पिता तो डॉक्टर हैं  इसलिये उनकी पत्नी की अस्पताल में बेहतर देखभाल होती रही ।  इस कारण उनकी पत्नी की डिलिवरी समय से पहले सिजेरियन तरीके से की गयी।  बेबी बॉय का जन्म हुआ जो पूरी तरह स्वस्थ और पूरी तरह कोरोना वायरस रहित है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि मां के गर्भ में शिशु को संक्रमाण नहीं हो सकता भले ही माता पिता दोनों  भीषण रूप  से संक्रमित हों । कहते हैं कि कोरोना संक्रमण से ग्रस्त लोगों में से सबसे ज्यादा मौतें बुजुर्गों की हो रही है और संक्रमित बुजुर्गों का बच पाना बहुत कठिन है। केरल में 92 साल के पति और 83 साल की उनकी पत्नी कोरना संक्रमण के उपचार और क्वारांटीन के बाद स्वस्थ हो कर अपने परिवार में लौट आये हैं। इस खबर को पढ़ कर सानियर सिटीजन खुश हैं और कह रहे हैं कि कोरोना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। दिल्ली के रजोकरी में एक व्यक्ति ने अपने वृद्ध पिता के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि पूरा परिवार लॉकडाउन के दौरान घर में ही सिमटा रहता है मगर  62 वर्ष  के पिताजी कई कई घंटे बाहर निकल जाते हैं। इस पर पुलिस ने उस व्यक्ति के पिताजी की तलाश कर परिवार के साथ खुल कर बात की और पिताजी को भी इस बात पर राजी करा दिया कि वो कोरोना के खतरे को देखते हुये  बिल्कुल घर से बाहर नहीं निकलेंगे।  अब कुछ घुमक्कड़ सीनियर सिटीजन परेशान हैं कि कहीं उनके बेटे उनके खिलाफ पुलिस में कोई रिपोर्ट दर्ज न करा दें।  जीवन रक्षा और मानव सेवा के कार्य में जुटे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों पर किये गये हमलों और उनके साथ की गयी बदसुलूकी को लेकर सरकारी अमले और सजग लोगों में चिंता है। जब कभी किसी संक्रमित व्यक्ति की जीवन लीला समाप्त होती है और शव को श्मशान ले जाया जाता है तो वहां हड़कम मच जाता है और मुश्किल से सीएनजी से संस्कार करने दिया जाता है। कोरोना ने पश्चिमी देशों को भी यह समझा दिया है कि शव के अंतिम संस्कार का सबसे व्यावहारिक तरीका पार्थिव शरीर को अग्नि को समर्पित करना है।