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2020 शिक्षा नीति, नए आयाम
August 31, 2020 • सजग ब्यूरो • शिक्षा

शिक्षा किसी भी राष्ट्र में परिवर्तन और विकास का पहला कदम है। भारतवर्ष में वर्तमान में मोदी सरकार है और मोदी जी विवाद पर नहीं विकास पर काम करने वाले हैं तथा इसी में विश्वास भी रखते हैं। विकास की इसी कड़ी में मोदी सरकार ने एक और नए कदम की शुरूआत की है। देश में 34 वर्ष बाद आयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को लेकर देश भर में शिक्षा व्यवस्था और उसमें होने वाले परिवर्तनों पर चर्चा-परिचर्चा हो रही है। साथ ही देश के शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी ने इस शिक्षा नीति के बारे में मीडिया और देशवासियों को अवगत कराया है। इतना ही नहीं मोदी जी ने भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की जरूरत बताते हुए इस पर राष्ट्र को संबोधित भी किया।

शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास का आधार होती है। शिक्षा ही भूत, वर्तमान और भविष्य को बता सकती है। समय और व्यवस्था के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन जरूरी है। राष्ट्र का युवा शिक्षित होगा तो राष्ट्र को नई-नई विकास योजनाएँ मिलेगी और राष्ट्र दिनों-दिन विकास के पथ पर अग्रसर होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर 26 अगस्त, 2020 को पोलैंड से आईसीसीआर, चेयर हिंदी, शिक्षाविद् डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला जी, भारतवर्ष से साहित्य सेवी और शिक्षाविद् श्री बी.एल. गौड जी तथा शिक्षाविद् डॉ. कामराज जी ने के.24 चैनल पर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर चर्चा की और राष्ट्र के विकास में इस शिक्षा नीति का क्या योगदान होगा इस विषय पर चर्चा हुई।

डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला जी ने श्री बी.एल. गौड़ जी से शिक्षा व्यवस्था में हुए परिवर्तनों पर चर्चा होने के साथ-साथ इस नई शिक्षा नीति में अलगाववादी, राष्ट्र विरोधी, संस्कृति विरोधी, मिथक और उस पर व्यभिचार फैलाने वाले साहित्य को पाठ्यक्रम से बाहर रखने की बात कही। यहाँ आपको बता दें कि, डॉ. शुक्ला ने भारतीय तथा 15 से अधिक देशों के प्रवासी हिंदी साहित्यकारों तथा अन्य भाषा सेवियों के साहित्य पर आलोचनात्मक और समीक्षात्मक अध्ययन किया है। इनका अनुभव और साहित्यिक दृष्टिकोण अद्भुत है। डॉ. शुक्ला ने भारतीय भाषाओं में शिक्षा पर जोर देने वाली व्यवस्था का समर्थन किया। इतना ही नहीं हिंदी को लेकर लोगों के मस्तिष्क में जो द्योम दर्जे का भाव फंसा रखा था, उसे भी दूर किया। श्री बी.एल. गौड़ जी ने भी विश्व भ्रमण के आधार पर अपने अनुभव से बताया कि हर एक देश में वहाँ के लोग अपनी भाषा में विकास करते हैं, बातें करते हैं। डॉ. शुक्ला ने भी बताया कि किस प्रकार पोलैंड में पोलिश भाषा में ही इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि की पढ़ाई के साथ-साथ सभी कार्य किए जाते हैं। भारत में फिर हिंदी में काम करने में क्या परेशानी है। इस नई शिक्षा नीति में हिंदी और प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में पढ़ाई को लेकर जोर दिया गया है। इसको सही ठहराते हुए डॉ. शुक्ला और श्री बी.एल. गौड़ जी ने साहित्यकारों को भी संस्कृति विरोधी और समाज विरोधी लिखने पर करारी फटकार लगाई।

इस कार्यक्रम में शिक्षा में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ शिक्षकों के कार्यभार पर भी चर्चा हुई। सरकारों को चाहे वह केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार शिक्षकों को शोध, अनुसंधान आदि तत्वों से जुड़ने की प्रेरणा देना चाहिए न की उनसे फालतु के काम लेने चाहिए। चाहे वह चुनाव के समय कार्य हो या किसी अन्य आपदा के समय के कार्य। जो व्यक्ति राष्ट्र को नई रोशनी दे रहा हो वह स्वयं अंधकार में जीवन जी रहा हो तो विकास कैसे संभव है अर्थात् शिक्षकों को स्थायी तौर पर नियुक्त किया जाए। सरकार को उन्हें भरोसे में लेना चाहिए साथ ही रोजगार परक व्यवस्था को सुचारू रूप से चालू करना चाहिए। इन विषयों पर भी सरकार को सोचना चाहिए आदि पर चर्चा हुई।

शिक्षा के बजट को लेकर भी चर्चा हुई साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास कैसे हो इन बातों पर जोर डाला गया। देश की शिक्षा व्यस्था में सुधार के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा। केन्द्र सरकार योजनाओं को लेकर आती है तो राज्य सरकारों को राजनैतिक भले-बुरे से ऊपर उठकर उसे जनता के बीच क्रियांवित करना होगा। जिससे बच्चों, युवाओं और लोगों का हित हो सके। मनीष सिसौदिया जी ने शिक्षा की व्यवस्था में सुधार करते हुए केन्द्र सरकार के शिक्षा संबंधी कार्यों को क्रियांवित किया है, ऐसा माना जा सकता है और यह देश के लिए एक बड़ा उदाहरण भी है। सरकारी स्कूलों के रिजल्ट में सुधार हुआ है, साथ ही नई योजनाओं ने भी पंख फैलाये हैं। मनीष सिसौदिया जी के प्रयासों और कार्यों की एकमत से तीनों विद्वानों ने प्रशंसा की।

श्री बी.एल. गौड़ जी ने नई शिक्षा नीति में सरकार द्वारा कौशल शिक्षा पर जो कार्य किया जाना है, उसे सरकार का सराहनीय कदम बताया। साथ ही इन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए अपनी पुस्तक को जो पाठ्यक्रम में लगी हुई हैं, इससे बच्चों को कौशल विकास में कैसे मदद मिली उसके बारे में भी बताया और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी के साथ हुई अपनी बातों को भी साझा किया। डॉ. शुक्ला जी द्वारा किए गए एक सवाल के जवाब में गौड़ जी ने शिक्षा और अनुभव के योग के बारे में बताते हुए कहा कि मोदी सरकार अब चाहती है कि केवल टेस्ट के माध्यम से ही लोग सेक्रेटरी लेवल पर नहीं, बल्कि अपने अनुभव, कर्तव्य परायण, निष्ठा, लगन, राष्ट्र हितैषी भावना, जन कल्याण का भाव, समझ और ज्ञान के आधार पर भी इस पद पर लगाए जा सकते हैं। डॉ. शुक्ला ने भी बताया कि पद पर बैठे लोगों को राष्ट्र भावना को समझना होगा, व्यक्ति से पद की गरिमा है, न की पद से व्यक्ति की।

यह शिक्षा नीति कार्यालयों के कमरों में बैठ कर नहीं बनाई गई है, बल्कि इसमें गाँव के व्यक्ति से लेकर, सरकारी अधिकारी, मंत्री, पक्ष-विपक्ष आदि सभी के विचारों को लिया गया है और फिर इसे धरातल पर उतारने की बात सोची गई है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर हुई इस सफल बातचीत को हमें समझ के साथ सुनना होगा और सरकार के पास भी इस सारगर्भित बातचीत को पहुँचाना होगा। जब हम सभी थोड़ा-थोड़ा प्रयास करेंगे तो राष्ट्र का विकास संभव है।