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हिंदी पत्रकारिता : चिंता , चिंतन व मनन का समय
May 29, 2019 • डॉ ० घनश्याम बादल

गति व प्रगति सराहनीय , खत्म हो रहा है कमतरी का अहसास 

बढ़ाई है प्रसार व पाठक संख्या मगर अपनी मूल प्रवृत्ति से विचलन ला रहा भटकाव , पेड़ न्यूज़ व दलगत झुकाव चिंता का सबब । कमीशन के दौर में मिशन पर अड़ने की जरूरत है आज ।

चंद बरस पहले तक हिन्दी पत्रकारिता को अंग्रेजी के पत्रकार घटिया तक कहने में नहीं चूकते थे , उसकी विश्वसनीयता व प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न खड़े करते थे यहां तक कि क्षेत्रीय पत्रकारिता को भी उससे बेहतर कहकर उसे लज्जित करते थे । उनके अनुसार हिन्दी पत्रकारिता केवल लफ्फाजी करती है , उसमें न डंक है और न ही कुछ नया करने की सोच व दृष्टि । अपनी अंग्रेजी पत्रकारिता और अपने स्टेटस पर इतराते हुए अपने अखबारों की प्रसार संख्या का बखान कर करके हिन्दी अखबारों और हिन्दी पत्रकारिता का मुंह चिढानआ आम बात थी ।

मगर आज ऐसा नहीं है ,आज एक से अधिक ऐसे अखबार हैं जो प्रसार संख्या में अंग्रेजी अखबारों से कहीं आगे हैं , वें नवाचार और प्रयोगों से नहीं घबराते हैं । हर ख़बर की ख़बर अब हिंदी पत्रकारिता जगत के पास भी इंटरनेट व अपने नेटवर्क की बदोलत पंहुच रही है । इस मायने में हिंदी पत्रकारिता अब सक्षम और सम्मानित स्थिति में कही जा सकती है

बीते कुछ दशकों में हिन्दी पत्रकारिता नें सिद्ध करके दिखाया है कि आज वह पिछलग्गू नहीं वरन् लीडरशिप की ताकत रखती है, न केवल राष्ट्रीय अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी धाक बढ़ी है । आज का हिन्दी पत्रकार खुद को किसी के आगे न दोयम समझता है न और न ही वह किसी से कम है , एक संघर्षपूर्ण यात्रा के बाद वह खाने कमाने की दृष्टि से
भी एक शानदार मुकाम पर है ।

पुरानी हिन्दी पत्रकारिता एक मिशन तो थी पर उसके पास संसाधन व आर्थिक ताकत और वह मारक क्षमता नहीं थी जो अंग्रेजी अखबारों की ताकत थी । तब के बड़े अखबार भी अंग्रेजी अखबारों की नकल करने के कारण 'ट्रेंड सैटर; नहीं थे और मालिकों के लिए भी घाटे का सौदा थे । पर , उनमें ग़ज़़ब का समर्पण , ललक और जुझारुपना था , जिजीविषा थी , बावजूद सारे दबावों के तब के कद्दावर संपादक , मालिकों व सरकार के दबाव मेंं नहीं आते थे । तब पेड न्यूज़ जैसे शब्द ही नहीं थे , विज्ञापन आ रहा था, पर , समाचारपत्र की जान खबर ही थी , तब भी मालिक उद्योगपति ही थे मगर अखबार पैसा कमाने की फैक्ट्री नहीं थे । हालांकि पत्रकार के लिए तब अखबार से
घर चलाना मुश्किल भरा था मगर वह सरकारों ,समाज व देश की दिशा तय करने का बड़ा काम कर रहा था । आज ऐसा नहीं है ,वह भी कमोबेश सेफजॉन; में रहकर दूसरे कर्मचारियों जैसी ही जिंदगी जी रहा है । तो इस लिहाज से भौतिक रूप में संपन्न होकर भी हिंदी पत्रकारिता विपन्न हुई है ।

यह दौर अब 'उद्दंत मार्तंड' जैसे अखबारों या पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों का नहीं है बल्कि मुनाफा कमाने, पावर गेम में गेमचेंजर की भूमिका निबाहने के इच्छुक महत्वाकांक्षी ऐसे लोगों का है जो खुद पत्रकार नहीं हैं पर पत्रकार बनाने की फैक्ट्री यानि शालाएं चलाने हैं , अपनी योजना और उद्देश्य पूर्ति के हिसाब से अखबार और पत्रिकार गढ़ते हैं । अखबार के माध्यम से राजनीतिक लक्ष्य पाने के इस खेल मेंं नेता तथा उद्यमी ही नहीं माफिया भी अगर कूद पड़े हैं तो बहुत ही चिंताजनक हालात होने जा रहे हैं हिंदी पत्रकारिता के । हालांकि हिंदी पत्रकारिता इतनी कमजोर भी नहीं की इन हालातो से वह निपट न सके ,जब जब ऐसा हुआ है उसने डटकर मुकाबला किया है और सफलता पाई है उम्मीद है इस बार भी यही होगा ।


अभी - अभी लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए हैं , नेताओं एवं दलों ने इन चुनावों में जिस प्रकार से मर्यादाएं तोड़ी हैं और घटिया से घटिया स्तर के आरोप तथा वाणी के साथ साथ देह की भाषा का प्रदर्शन किया है उसमें कहीं ना कहीं हिंदी पत्रकारिता जगत भी प्रभावित हुआ है । इस बार कुछ अखबारों ने तो सारी हदें पार करते हुए अपने संपादकीय तक कुछ राजनीतिक दलों के पक्ष या विपक्ष में लिखकर चुनाव प्रभावित करने की कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी और किसी हद तक किया भी , अब इसे हिंदी पत्रकारिता जगत की ताकत कहें या या कमजोरी ? 


भले ही सत्ता प्रतिष्ठान की शरण में जाकर कुछ सुविधाएं वह ताकत मिल जाए मगर भूलिए नहीं कि आप लोकतंत्र के ऐसे चौथे स्तंभ हैं जिस पर न्यायपालिका कार्यपालिका या व्यवस्थापिका किसी का भी असर नहीं होना चाहिए अपितु आप को निष्पक्ष दृढ़ निश्चयी और तटस्थ रहते हुए भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूती प्रदान करनी है और यदि आप भी राजनीति के इस खेल में शामिल हो गए तो फिर समझिए कि कुछ अनहोनी होनई तय है जिसका प्रभाव आप पर भी होने से नहीं रोका जा सकता है ।
हिन्दी पत्रकारिता कई संदर्भों में बहुत आगे आई है तो कई मोर्चो पर पतन की ओर बढ़ी है । कुछ फ्रंट ऐसे हैं जहां से वह लीडरशिप करती नजर आ रही है तो कुछ पर उसने पुराना गौरव भी खोया है । भटकाव का सबसे बड़ा संकट जो आज सामने खड़ा़ नज़र आता है वह है पत्रकारिता में ऐसे तत्वों की घुसपैठ होना जो इस क्षेत्र के न तो लायक हैं और न ही उनमें वह भाव है जो एक पत्रकार में होना चाहिए । इस विचलन और पतन से बचाने के लिए

वरिष्ठ पत्रकार आगे आएं तभी हिंदी पत्रकारिता सर ऊंचा रख पाएगी । चापलूस रीढ़हीन लोगो से यह उम्मीद बेमानी है । अस्मिता और लीडरशिप के संकट भी भी बाकी हैं । संकट का अहसास कराते बहुत से कारण हैं जैसे मालिकों के रूप में शुद्ध नाफाखोर लोगों का आना ,माफियायों व राजनीतिज्ञों का एक खास लक्ष्य के अखबार प्रकाशित करना , अपने कारोबार के लिए एक ढाल के रूप अखबार का प्रयोग करना , काले धंधों को चलाने के लिए पत्रकारिता का सहारा लेना पत्रकारों के नाम पर दबंग किस्म के लोगों को रखना , विज्ञापनों के लिए अनुचित दबाव डालना व ब्लैकमेल तक करने से न चूकना , विज्ञापन के बदले प्रांतीय खबर छापना , किसी खास दल व सरकार का पक्ष लेना या उसका गैर वाजिब विरोध करना , टी वी चैनलों की तर्ज पर नकारात्मक खबरों पर जोर रखना , गॉशिप को असल खबर का रूप देना आदि आज की पत्रकारिता के ऊपर कई सारे प्रश्नवाचक चिह्न छोड़ रहे है । पर , हिंदी पत्रकारिता ने पहले भी कई संकट झेले हैं आगे भी झेलने में वह सक्षम है , मगर अति आत्मविश्वास घातक भी हो सकता है कमर कस कर सच के साथ चलकर ही चौथा खंभा लोकतंत्र की इमारत को सहारा दे सकता है । नि:संदेह , हिन्दी आगे पत्रकारिता बढ़ रही है , और नई संभावनाएं जगा रही है । पर , डर भी लगता है उसके विकार व दिशा भटकाव देखकर । आज भी वेतन के नाम पर लुटते पत्रकार कब तक हिंदी पत्रकारिता का परचम लहरा पाएंगे इस तरह आज उनके और उनके परिवार के लिए बहुत कुछ करने की भारी जरूरत है