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स्किल इंडिया है जनविस्फोट का हल
July 20, 2019 • डॉ० घनश्याम बादल

२१ सदी का उभरता सितारा , १३३ करोड़ सिरों वाला भारत जनसंख्या विस्फोट का प्रतिमान बनकर भी उभरा है । एक ऐसा देश जहां अभी तक भी करीब 30 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे का जीवन व्यतीत करते हैं और तमाम उन्नति के बावजूद भी , जीवन की आधारभूतसुविधाएं करीब एक तिहाई लोगों को उपलब्ध नहीं हैं ।
परेशान करता जन विस्फोट :
सोचिए, कैसी हालत होगी उन लोगों की जिनके पास न सिर छुपाने को छत हैं , न पौषक और पर्याप्त भोजन । अच्छे वस्त्रों व शिक्षा की तो बात ही दूर की कौड़ी है । जनविस्फोट अब संघर्ष का पर्याय बन गया है । जनविस्फोट की वजह से न अमीर को चैन है न गरीब को सुख । दोनों एक दूसरे को अपना दुश्मन मान रहे हैं । ज्यादा जन और कम संसाधनों के कारण आज देश वर्ग
संघर्ष में उलझा है । समाजवाद व समानता की अवधारणा करीब - करीब मर गई है , आदमी से मशीनें महत्वपूर्ण हो गई हैं आज के लालच में आने वाले कल की चिंता गायब है यदि समय रहते कुछ नहीं किया गया तो हालात और भी खराब हो सकते हैं ।
अमीरों के ठाठ , गरीबों को पाठ :
अमीर देशों के लोगों के ठाठ के बारे में सुनकर गरीब लोगों के मन में आक्रोश होना बहुत स्वाभाविक है । अगर मनोवैज्ञाानिकों की मानें तो एक दिन यही गुस्सा विश्व युद्ध को न्यौता दे सकता है । इस आक्रोश को समय - समय पर कई देशों में जन आंदोलनों व सत्ता पलट के रूप में देखा भी जा चुका है ।
पहले तो केवल विकासशील देश ही इस समसया से जूझते थे पर अब तो विकसित देश भी जनविस्फोट के परिणामों को लेकर चिंतित हैं , उनके विशेषज्ञ गरीब देशों पर आरोप लगाने से भी नहीं चूक रहे हैं कि उनकी ही वजह से सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं । गरीब देशों के नागरिकों में भी विकसित राष्ट्रों के नागरिकों के प्रति एक दुर्भावना पनप रही है क्योंकि अब वें यह लगे हैं विकसित देश जिस अकूत संपत्ति व संपन्नता के मालिक हैं वह गरीब मुल्कों की ही दौलत थी ।
सबसे ज्यादा है भारत की दर :

लगातार हो रहे जनविस्फोट से एक बड़ा ख़तरा सामने दिखता है कि कहीं यें गरीब मिलकर अपने अस्तित्व की खातिर भयंकर विनाश को जन्म न दे दें । अतः समय की मांग है कि गंभीरता पूर्वक जनविस्फोट की समस्या से तो निपटा जाए और इसके मूल कारणों की पड़ताल कर उन्हे रोका जाए । भारत में तो तेजी से बढ़ती जनसंख्या आज की सबसे बड़ी समस्या है । जनसंख्या वृद्धि दर में कमी के बावजूद भी हम सारी दुनिया में सबसे ज़्यादा जनसंख्या बढ़ा रहे हैं और आने वाले 25 - 30 बरस में ही आज के हालात रहने पर चीन भी हमसे पीछे होगा । यदि क्षेत्रफल पर नज़र डालें तो चीन हमसे कई गुना बड़ा है पर जनसंख्या में हम करीब करीब उसके बराबर हैं ।
रोग यह पुराना है :
गौर से देखा जाए तो जनविस्फोट सदियों पुरानी ऐसी समस्या है जो अब बेकाबू हो चली है । हालांकि ठंडी जलवायु व ध्रुवों के नज़दीकी क्षेत्रों में आज भी जनसंख्या घनत्व बहुत कम है इसी तरह मरुस्थल व दुर्गम पहाड़ी इलाके आज भी 'मानवसमूह' देखने को तरसते हैं पर गर्म , मानसूनी व मैदानी व उपजाऊ इलाको में जनविस्फोट की भयंकर नदी बह रही है जो उनकी सारी प्रगति को लीेल रही है ।
माल्थस सिद्धांत भी फेल :
माल्थस का 'जनसंख्या संतुलन सिद्धांत' भी आज भौतिक सुविधाओं के बढ़ने , संसाधन मिलने व उनके नए - नए उपयोग ढूंढ लेने से फेल हो गया है । इक्के दुक्के इलाकों को छोड़ दें तो आज महामारी , बीमारी , अकाल , व भूख से मौतें न के बराबर ही सुनाई देती हैं और जहां होती भी हैं वें ऐसे सुदूर इलाके हैं जहां हम कुछ कर पाने की ही हालत में नहीं होते ।
जनविस्फोट की जड़ :
जनविस्फोट नकारात्मक व सकारात्मक दोनों ही कारणों से हुआ है । जहां शिक्षा  का अभाव , औरत को सेक्स मशीन में तब्दील कर देना , उसकी आर्थिक स्थिति खराब होना , परिवार नियोजन के साधन या उनके सही उपयोग का पता न होना , संतान उत्पत्ति को ईश्वरीय देन मान बैठना , धर्म से जोड़ देना , अपने वर्चस्व की लड़ाई के नाम पर ज्यादा से ज्यादा संतान पैदा करना , वर्ग संघर्ष में संख्याबल से विजय पाने की चाह , अपनी आय कम होने से संतान की कमाई से आगे बढ़ने का लोभ , दूरदृष्टि की कमी,जागरुकता का अभाव ,रुढियां , वंशबेल को आगे ले जाने का मोह आदि अनेक नकारात्मक कारण हैं तो वहीं बढ़ती सुविधाएं , स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी हो जाना , अच्छे इलाज की व्यवस्था होना , जीवन स्तर में वृद्धि होना , भूख , अकाल , कुपोषण , बीमारी , प्राकृतिक आपदाओं से मौतें अपेक्षाकृत कम होना आदि अनेकानेक कारणों ने भी जनसंख्या को तेजी से बढा़या है ।

जनसंख्या लील रही विकास :
भारत में तो जनविस्फोट की अब हद हो गई है । कारण कुछ भी व कितने भी हों पर असलियत यही है कि सुरसा के मुख सी बढ़ती आबादी न केवल विकास की गति को मंथर कर रही है अपितु जनसंख्या के एक बड़े भाग का पेट भरने में जी डी पी यानी कुल राष्ट्रीय आय का अधिकांश हिस्सा खर्च हो रहा है ।
हल तो है !
अब सवाल यह है कि इस समस्या का हल क्या हो ? क्या जन्म वृद्धि दर पर रोक से काम बन जाएगा ? या चीन की ही तरह भारत में भी कठोर नीति बने और सब पर एक से ज़्यादा बच्चे को जन्म देने पर प्रतिबंध आयद किया जाए ? पर क्या इतने सारे धर्मो व राजनीतिं के चलते यह संभव है भारत में ? शायद नहीं । फिर क्या हो ?
ज़रुरी है जनजागरण :
जनविस्फोट रोकने के लिए जनजागरण बहुत ज़रुरी है । आम आदमी को समझाना होगा कि तरक्की का रास्ता कम बच्चे पैदा करने वाली सड़क से गुजरता है । कम संतान , मतलब कम जिम्मेदारी व अच्छा पालन पोषण है और अपनी व बच्चों की योग्यता से समाज में ज्यादा सम्मान मिलता है न कि ज्यादा संख्या में बच्चे पैदा करने से और समृद्धि के रास्ते भी खुलते हैं। कम बच्चे मतलब कम बंटवारा यानि हर एक का हिस्सा ज्यादा अर्थ वही सबको मिले पर्या प्त तो संघर्ष समाप्त मानिए । यूरोप इसका बेहतरीन उदाहरण है तो गर्म जलवायु और सैक्स षिक्षा की कमी इस लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ा रोड़ा है ।
सेक्स एजुकेशन जरूरी :
बहुत जरुरी है कि ऐसा उपाय किया जाए कि लोग जानें कि संतान ईश्वर की देन नहीं वरन् एक जैविक प्रक्रिया है जिसे नियंत्रित कर सकते हैं । इस बात को समझाने के लिए अब हमें हिचक छोड़ कर डोर टू डोर सेक्स एजुकेशन का दीप जलाना होगा , खास तौर पर स्त्रियों की हालत और सोच को बदलना होगा , पुरुष को भी समझाना होगा कि कम संतान पैदा करना ही उन्नति के दरवाजे खोलेगा और स्त्री का उसे सेक्स मशीन समझने की प्रवृत्ति से बाहर आना होगा । सबसे बड़ी बात गांव की स्त्री को आर्थिक रूप से मज़बूत करना होगा ।
जनसंख्या को श्रमकुशल बनाएं :
संभवतः सबसे प्रभावशाली उपाय है जनसंख्या को कुशल बनाया जाए । जब तक देश को कुशल श्रम नहीं मिलेगा , तकनीकी का प्रशिक्षण कारगर तरीके से नहीं मिलेगा जनसंख्या एक बोझ लगती रहेगी । हमें चीन और जापान से इस बारें में सीखना होगा कि मानव संसाधनों का बेहतर व प्रभावषाली उपयोग कैसे किया जा सकता है । हमें जनसंख्या को बिना किसी धर्म , राजनीति
या क्षेत्र से पक्षपात किए , श्रमकुषल बनाकर देश की कुशलता व विकास को सुनिश्चित करना होगा ।