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यू. एन. आई को माफियाओं से मुक्त कराने के लिए आंदोलन को तेज़ करने का फैसला ।
July 22, 2019 • Shiv Sachdeva

बंदी के कगार पर  पुरानी समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (यू. एन. आई) के अस्तित्व को बचाने , इसकी चल- अचल संपत्ति की रक्षा एवं इसे माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने को लेकर आंदोलन को तेज़ करने का फैसला लिया गया है।

यह  जानकारी संस्था को बचाने के लिए  संघर्षरत "सेव यू. एन. आई मूवमेंट " के प्रवक्ता सनंत सिंह ने  यहाँ दी है ।। उन्होंने बताया कि गत दिनों हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया।

इस बैठक में आंदोलन से जुड़े मूवमेंट के समन्वयक एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. समरेंद्र पाठक , सिने जगत की पत्रिका सिने आजकल के प्रधान संपादक कुमार समत , मिथिला आंदोलन के प्रणेता प्रो.अमरेंद्र झा , उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार सुल्तान कुरैशी , पत्रकार मनोज कुमार , पत्रकार राजेंद्र प्रसाद दुबे,  अधिवक्ता विजय शंकर लाल कर्ण, समाज सेवी एम्.एम्.खान , एन. डी.पी. एफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बाबू मुन्ना, पत्रकार मिहिर कुमार झा, रुट न्यूज़ ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार  सुबीर सेन  एवं श्याम सिंह और समाज सेवी शंकर झा बाबा मौजूद थे।

उन्होंने बताया कि एक दर्जन से अधिक सांसद पहले ही प्रधान मंत्री एवं सूचना एवं  प्रसारण मंत्री को यू. एन. आई की रक्षा के लिए रिसीवर नियुक्त करने की मांग कर चुके है और यह मामला सरकार में लंबित है । 

प्रवक्ता ने कहा है कि यू. एन. आई पर वर्ष 2012 से अवैध रूप से काबिज भूमाफियां इसकी चल अचल संपत्ति को बेचने की कोशिश में जुटे है । नई दिल्ली स्थिति 9/ रफ़ी मार्ग की भूमि की भी कई बार गुप चुप तरीके से सौदे बाजी की गयी। जयपुर में आवंटित भूमि का भी यही हाल हुआ और अब बेंगलूर  की संपत्ति के साथ भी  ऐसा  ही हो रहा है। कर्नाटक सरकार को भूमि आवंटन रद्द करने का फैसला जनहित में लेना पड़ा है।

इससे पहले मूवमेंट के संयोजक डॉ. आर.के रमन ने आरोप लगाया था  कि  हज़ारों करोड़ों के घोटालेबाज कांग्रेस के  सांसद रहे स्व. प्रफुल्ल माहेश्वरी ने आपने कार्यकाल में श्री विश्वास त्रिपाठी नामक एक व्यक्ति को अवैध तरीके से यू. एन. आई बोर्ड में लाया, जो आज इस संस्थान का मालिक बन बैठा है।  

उन्होंने कहा था कि इस संस्थान पर कर्मचारियों का करीब 100 करोड़ रुपए विभिन्न मदों में बकाया है। सरकार कर्मचारियों की यह राशि दिलाने की शीघ्र व्यवस्था करें।

उल्लेखनीय है ,कि मूवमेंट इन मांगों को लेकर पिछले छह वर्षों से संघर्षरत है और यह मामला एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा बना हुआ है।