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नई सोच से करे नवरात्र सफल
October 3, 2019 • डॉ० घनश्याम बादल

नवरात्रों में कन्याओं को ढूंढ ढूंढ कर उनका पद पूजन किया जा रहा है भोजन कराया जा रहा है , उनमें देवी के दर्शन किये जा रहे हैं , कितना अच्छा लगता है नारी को सदियों तक पूजने व मानने वाले देश में ये सब देखकर । पर , सच क्या है यह भी छुपा नहीं है किसी से नौ दिन का सम्मान , पूजन , खिलाना पिलाना एक तरफ और रोज की दुत्कार , उपेक्षा , दमन , गर्भ में मार देने की प्रवृत्ति एक तरफ , यही है इस देश का सच ।

मिटाएं लिंगभेद :
खुद को आधुनिक , प्रगतिवादी , उदार ,व नई सोच का , सिद्ध करने वाले देश में जब यथार्थ देखते हैं तो समाजिक सोच को उसी गहरे गर्त में पाते हैं जहां पाषाण काल में थी । पुरुषवादी सोच हमें छोड़ने को तैयार नहीं हैं , नारों में , आधुनिकता का 'मास्क' गाए घूमना हमें खूब आता हैं ।
भले ही नजीर कुछ भी दें , कानून में भी लिंग भेद की कोई जगह नहीं हैं पर जब अपने घर की बात आती है तो जायज नाजायज सब भूल कर बेटे को बेटी पर तरजीह देने में न कोई हिचक न ही शर्म आती है । बेटे - बेटी का भेद सारे प्रयासों के बाद भी आधे से ज्यादा भारत में है , गांव ही नहीं शहर भी अंदर अंदर इस भेद भाव से ग्रस्त हैं । नवरात्र तब सार्थक होंगे जब भेदभाव की यह खाई पटेगी ।
दें स्वतंत्रता व सम्मान :
आज भी अपनी मर्जी का जीवनसाथी चुनने का अधिकार लड़कियों को देने को हम कतई तैयार नहीं हैं, और यदि वह अपना यह अधिकार लेने की जुर्रत करती है तो उसके हिस्से में आती है ज़िल्लत , रुसवाई या मौत । जाति ,गौत्र , वर्ग सम्प्रदाय या हैसियत के बहाने से लड़की को दबाने का कोई मौका हम हाथ से नहीं जाने देते हैं । तथाकथित सम्मान के कम होने मात्र की आशंका से ही से ''पूजनीय कन्या'' को मौत के आगोश में सुला देते हैं हम । अगर सचमुच नवरात्र सार्थक करने हैं तो लड़की को पूरी आजादी व सम्मान दें ।
करें कन्याओं को सबल :

एक नजर युवा दुनिया की हालत पर डालें तो दिल दहलाने वाला परिदृश्य दिखता है । बढ़ते अनाचार और टूटती बिखरती मर्यादाओं की सबसे ज्यादा मार लड़की पर ही पड़ती है, उसके उत्थान व प्रगति का श्रेय संस्थाएं , व्यक्ति , सरकार और समाज बड़े ही जोर शोर से लेते हैं पर आज भी लड़की को कभी दैहिक तो कभी मानसिक संत्रास से गुजरने को बाध्य करते हैं बचपन
से जवान होने तक एक डर में ही जीने को विवश है कन्या । यदि कन्याएं सबल नहीं होंगी तो नवरात्र भी सफल नहीं हो सकते ।
सुरक्षा कवच प्रदान करें :
बेशक बेटियों ने नए से हैं, नए से नए क्षितिज भी छुए हैं , पर कई् मुकामों पर वह आज भी वहीं खड़ी है जहां वह आज से पचास साल पहले खड़ीे थी । पढ़ी लिखी लड़कियों ने बहुत कुछ पाया है तो ऐसा बहुत कुछ गंवाया भी हैे जो उसके लिये कहीं ज्यादा जरुरी था । अपने अधिकारों की कीमत लड़कियों को चुकानी पड़ी है ।सहज विश्वास भी नहीं होता कि हम उसी भारतीय समाज में रह रहे हैं जिसमें लड़कियों की बेहद इज्जत करने की समृद्ध परंपरा रही है व जहां पर रिश्तों की एक ऐसी संस्कृति रही है जिसमें बेटी ही नहीं वरन् अपने आस पास की लड़कियों की भी पूजा की जाती रही है । पर , आज तो लड़कियां बाहर तो क्या अपने ही घर में भी सुरक्षित रह गई हैं ? लड़कियों की सुरक्षा आज के समय की मांग है ।
कमाई पर हो अधिकार :
हम तो चाहते हैं कि वह कमाएं पर शर्त यह कि उसका , हर निर्णय हम ही तय करें , समान कार्य करने पर भी पुरुष के मुकाबले कम वेतन दिया जाता हैं, कार्य स्थलों पर उसके यौन शोषण की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं । लगभग 60 प्रतिशत संस्थानों में उसे अपने ही सहकर्मियों की छींटाकशी का शिकार होना पड़ रहा है । बाहर ही क्यों घर की चारदीवारी में भी लड़की ही सबसे ज्यादा शोषण की शिकार बनती है। अगर सचमुच आप कन्याओं के कद्रदान हैं तो उन्हें उनकी कमाई पर पूरा हक़ भी दें ।
दकियानूसी सोच त्यागें :
बलात्कार , शोषण , दहेज , हत्या , असुरक्षा , बदनामी , छेड़खानी , अपमान का भय बेटियो के पंख कतरने को काफी है । गर्भ में ही उसकी भ्रूण हत्या कर देने जैसे कृत्य के चलते बालक - बालिका अनुपात बुरी तरह गड़बड़ा गया है । 1000 पुरुाषों पर महज 841 बालिकाओं का आंकड़ा डराता है पर व्यक्तिगत स्वार्थों , व दकियानुसी समाज के चलते बदस्तूर बालिकाओं की भ्रूण हत्या जारी है बिना ये सोचे कि यदि यह चलता रहा तो कहां जाएंगें वें 160 लड़के जिन्हे आने वाले समय में दुल्हन या तो मिलेगी ही नहीं या फिर एक बार फिर से बहुपत्नी प्रथा वापस खड़ी दिखेगी । कहीं फिर से '' जिस घर सुंदर बेटी देखी , ता घर जाय  धरे हथियार '' वाला युग वापस न लौट आए डर इस बात का भी है ।
बेटी हो गर्व का सबब :
आज भी लड़की होना दर्द का सबब है , भले ही कुछ प्रतिशत लोग लड़के - लड़की को बराबर मानते या कहते हों पर कड़वा सच यही है कि आज भी दोनों में फर्क है , , कहने की बात और है व वास्तविकता कुछ और । करीब 50 प्रतिशत मां - बाप आज एक लड़के के पैदा होने पर 'बस' कर देते हैं पर लड़की के मामले में ये अनुपात ना के बराबर है । यदि कुछ लोग ऐसा करते भी हैं उनमें से एक बहुत बड़ा भाग बाद में इस या उस वजह से 'पछताता' देखा गया है । बेटी को जन्म से ही अपना गर्व व गौरव समझें तभी सार्थक होगा नवरात्र का पर्व