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दुनिया भर में पूजी जाती हैं देवी शक्तिशाली: माँ दुर्गा और काली
September 30, 2019 • शिखर चंद जैन

नवरात्र में शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा और माँ काली की पूजा अर्चना की जाती है. आपको यह जानकर शायद अचरज होगा कि माँ काली की पूजा न सिर्फ हमारे देश में बल्कि दुनिया के कई दूसरे देशों में भी होती है. हमारे देश में भी कुछ जगह माँ काली का पूजन जरा अनूठे अंदाज में किया जाता है - 

विदेश में माँ काली-

मैक्सिको – यहाँ की प्राचीन एजटेक सभ्यता में कोटलीक्यू नामक एक देवी का उल्लेख है। ये सृष्टि और संहार की देवी है। देवी काली के साथ इनकी कई चीजें मिलती हैं। कोटलीक्यू को 'लेडी ऑफ द स्कर्ट ऑफ सर्पेंट्स' और 'गॉडेस ऑफ द सर्पेंट पेटीकोट' कहा जाता है। इनकी छाती पर इंसान के हृदय की माला है और पैंडेंट की तरह लटकता हुआ एक नरमुंड है, जिसे हजारों हाथों ने पकड़ रखा है। इस देवी को मां कहकर भी संबोधित किया जाता है। आज भी मैक्सिको के रेड इंडियन इन्हें अपना रक्षक मानते हैं।

यूरोप, आयरलैंड – इन देशों में काली उपासना लिए कैले-दे कहा गया है। कैले काली से मिलता-जुलता शब्द है। यहां के केलियेक देवी काली मां का ही यूरोपीय संस्करण हैं। जैसे हमारे यहां कष्टों से मुक्ति के लिए मां सुराकाली की पूजा करते हैं और मन्नत मांगते हैं, उसी तरह आयरलैंड में स्माल पॉक्स से आक्रांत होने पर देवी केलियक की मन्नत मानते हैं। हमारे यहां की तरह वहां भेड़ों की बलि चढाने की भी प्रथा है। वैसे चेचक को हमारे यहां भी माता कहा जाता है।

स्कॉटलैंड –इस देश को कभी केलीडोनिया यानी काली द्वारा प्रदत्त भूमि या कैले कहा जाता था। स्कॉटलैंड का नामकरण देवी स्कोटिया के नाम पर हुआ है। ये भी एक कृष्णवर्णा देवी थीं।

फिनलैंड – यहाँ की कृष्णवर्णा देवी का नाम कालमा है। यह कालमा शब्द काली मां शब्द से आया है या नहीं, यह शोध का विषय है।लेकिन सुनने में यह कालिका माँ या काली माँ जैसा ही लगता है.

स्पेन – यहाँ के लोगों द्वारा कैलिफा या कैलीफिया देवी पूजी जाती थीं। इन्हीं देवी के नाम पर उत्तर अमरीका की नई आविष्कृत भूमि का नाम कैलिफोर्निया रखा गया।

दक्षिणी फ्रांस - यहाँ देवी सारा-काली की पूजा के लिए सालाना उत्सव आयोजित किया जाता है। जिप्सी लोग भी कृष्ण वर्ण की देवी सारा-काली को पूजते थे।
 
अनूठे भोग-चढावे 


ताले का चढ़ावा – कानपुर के बंगाली मोहल्ले में मां काली का 500 साल पुराना मंदिर है। यूं तो यहां रोज ही भक्तगणों का तांता लगा रहता है लेकिन मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं और मनौती मांगने वालों की विशेष भीड़ होती है। यहां आप भक्तों का हाथ में नए-नए ताले देखें, तो ताज्जुब न करें। दरअसल इस मंदिर के संबंध में मान्यता है कि जो यहां ताला चढ़ाकर कोई भी मनौती मांगता है, वह मां काली अवश्य पूरी करती हैं। यह मान्यता बहुत पुरानी है, लेकिन इसकी निश्चित तिथि बताने में कोई सक्षम नहीं है। मौजूदा पुजारी की कई पीढ़ियां मां काली के सेवा कर चुकी हैं। 

चाउमीन का भोग – कोलकाता का टैंगरा क्षेत्र चीनी भाषियों का खास अड्डा है। इस क्षेत्र को चाइना टाउन के नाम से भी जाना जाता है। यहां मौजूद एक काली मंदिर अनजान और नए लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। वैसे तो मां काली हिंदुओं की देवी हैं, लेकिन यहां के चीनी न सिर्फ इन्हें पूरी श्रद्धा के साथ पूजते हैं बल्कि अपनी संस्कृति के अनुसार उन्हें चाऊमीन, चावल और अन्य शाकाहारी चीनी भोजन का भोग भी चढ़ाते हैं। दो संस्कृतियों के मिलन का यह अनूठा उदाहरण है।कहते हैं 60 वर्ष पहले इस कसबे में एक चाइनीज परिवार में बच्चे की तबियत खराब हो गई थी। कई जगह इलाज कराने पर भी जब बच्चा ठीक नहीं हुआ, तो वह परिवार बच्चे को लेकर मां काली की शरण में आए। यहां आते ही बच्चे की तबियत ठीक हो गई। इसके बाद चाइनीज समुदाय के लोगों ने इस मंदिर को अच्छे से बनवाया और यहां पूजा करने लगे। इसके बाद से ही इस मंदिर को चाइनीज काली माता का कहा जाने लगा और यहां पूरे विधि विधान से देवी की पूजा की जाने लगी। नवरात्र में कुछ चाइनीज व्रत भी रखते हैं। इसमें वे आम हिंदुओं की तरह फल और व्रत का खाना ही खाते हैं। 

काली कलकत्ते वाली

देश के किसी भी हिस्से से जब कोई आस्तिक व्यक्ति  कोलकाता आता है तो वह कालीघाट जाने की इच्छा जरुर जताता है. यहाँ की काली ही कलकत्ते की रक्षक मानी जाती हैं. यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि माँ पार्वती रौद्र रूप में भ्रमण कर रही थीं  तब उनके दांये पाँव की चार अंगुलियां यहीं गिरी थीं. इसी कारण इसे 51 शक्तिपीठो में माना जाता है | यहा माँ काली के प्रचंड विग्रह  के दर्शन होते हैं|काली माँ की लम्बी जीभ जो सोने की बनी हुई है बाहर निकली हुई है और हाथ और दांत भी सोने से ही बने हुए है| माँ की मूर्ति में चेहरा काले रंग का है और आँखे व सिर केसरिया रंग में है| वर्तमान मंदिर 19 वीं शताब्दी का है। हालांकि 15 वीं और 17 वीं शताब्दी के कुछ भक्ति साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि कालीघाट मंदिर चंद्रगुप्त द्वितीय के समय से अस्तित्व में है। मूल मंदिर एक छोटी झोपड़ी के आकार का ढांचा था, जिसे राजा मानसिंह ने 16वीं शताब्दी में बनवाया था। वर्तमान संरचना 1809 में सुवर्ण रॉय चौधरी के मार्गदर्शन में पूरी हुई