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चुनाव के बाद : ग़ैर ज़रूरी और ख़तरनाक हैं एग्जिट पोल सर्वेक्षण
May 22, 2019 • डॉ० घनश्याम बादल

'' लोकसभा के चुनाव पूरे हुए । सरकार बनने की प्रक्रिया २३ मई के बाद सिरे चढ़ेगी । इससे पहले चुनावी पंडितों पत्रकारों विश्लेषकों और सर्वे करने वाली संस्थाओं का आकलन जोर घटा जारी है सबके अपने अपने कयास हैं और सब के अनुमानों के पीछे उनका अपना गड़ा हुआ एक तर्क है सब के सब उसी तर्क की पोटली को उठाएं अपने अपने तरीके से दलों को मिलने वाली लोकसभा सीटों का आकलन कर रहे हैं टीवी पर चैनलों के एंकर अपने पहले की तरह की तरह केही रूप में चिल्ला चिल्ला कर करीब - करीब हर वक्त आ की बात को काटने का ठेका दिए हुए हैं तो वही विभिन्न दलों के नेता अपनी अपनी सुविधा और पार्टी लाइन के अनुसार ज्ञान भगा रहे हैं कोई भी इन चुनावों में हार मानने को तैयार नहीं है सब के सब जाति मजहब क्षेत्रवाद और ऐसे ही कितने ही आयामों के आधार पर अपनी अपनी पार्टियों को न केवल जिता रहे हैं अपितु भारी बहुमत से सरकार बना रहे हैं 21 मई से 23 मई के बीच ऐसा लगता रहा गोया सरकार बनाने का काम आम मतदाता का नहीं अपनी तो इन्हीं नेताओं या चैनलों का है अब किस का सर्वे कितना सटीक बैठता है यह तो 23 मई के बाद ही पता चलेगा मगर इन सर्वे करने वाली संस्थाओं के अनुमानों में भी भारी अंतर देखने को मिला है हास्य की बात तो यह है कि एक सर्वे करने वाली संस्था ने तो अपने द्वारा आकृति की
गई सीटों की संख्या 614 कर दी है उत्तर प्रदेश में एक सर्वे कर्ता संस्था भाजपा को 65 से ऊपर सीट दे रही है तो वही यूपी खाते में केवल 2 सीटें वह भी प्लस माइनस 2 के हैश टैग के साथ दिखा रही है और सपा बसपा गठबंधन को 22 सीटें दे रही है वहीं दूसरे चैनल पर दूसरी संस्था ठीक इसके विपरीत भाजपा को 22:00 और सपा बसपा गठबंधन को 60 से 65 सीटें दे रही है यह लिखने का मतलब केवल यही है की कितना विचलन इन संस्थाओं के आकलन में है और यह कितना सच सिद्ध होगा यह 23 तारीख को निकलने वाले अधिक नतीजों के बाद ही पता चलेगा।
हालांकि पिछले चुनावों में केवल सर्वे एक संस्था का अनुमान करीब करीब सही निकला था मगर बाकी ऐसी 50 और संस्थाएं अपने आकलन में मुंह के बल गिरी नजर आई थी और किसी ने भी राजद को मिलने वाली अभूतपूर्व सफलता का 2014 के चुनावों में कयास नहीं लगाया था वहीं इन चुनावों में भी इन सर्वेक्षण करने वाली संस्थाओं के आंकड़ों में भारी अंतर है एक बार फिर 23 तारीख से पहले हम इन आंकड़ों को नजला सकते और ना ही इन्हें सही मान सकते हैं हां चैनलों पर और अखबारों में राष्ट्रीय नेताओं से लेकर गली मोहल्ले के छूट गई है नेताओं तक का अपना अपना आकलन जारी है और इसका सबसे बड़ा फायदा ले रहा है सट्टा बाजार एक अनुमान के अनुसार इस समय सट्टा बाजार अपने चरम पर है और इसमें सट्टे में लगने वाली राशि 100 अरब रुपए से भी कहीं अधिक है इसमें भी की जीतने वालों की संख्या ना के बराबर होगी और अधिकांश व्यक्ति अपनी गाढ़ी कमाई हार जाएंगे ठीक ऐसा ही मतदाता और दलों के बीच दिखाई देता है अब सरकार किसी की भी बने सत्ता में कोई भी आए प्रधानमंत्री मोदी बने या विपक्ष का कोई नहीं था सरकार एन डी ए की बने या किसी दूसरे गठबंधन की यह पूर्ण बहुमत की सरकार हो या खिचड़ी सरकार यह 5 साल चले या दो चार पांच महीने में ही गिर जाए यह सब तो तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर रहेगा मगर इस राजनीतिक गहमागहमी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन राजनीतिक
दलों ने या गठबंधन ने जितने वादे किए हैं और आश्वासन इन चुनावों में जनता को दिए हैं क्या वे उन्हें पूरा कर पाएंगे या फिर उन्हें पूरा करने की उन्हें राजनीतिक सामर्थ्य प्राप्त होगी अथवा क्या उनकी नियत इस विषय में साफ रहेगी यह गहन मंथन का विषय होना चाहिए पर हो केवल शोर रहा है ।
इस लगभग मुद्दाविहीन चुनाव में चुनावों के बाद सबसे बड़ा मुद्दा यही होगा कि जीतने वालों ने जो वादे किये थे उनका क्या होगा ? क्या वें पूरे होगें ? या वें पूरे हो भी सकते हैं ? क्या उनका कोई रोड़मैप अभी तक बना है ? क्या कानून और संविधान उन्हे पूरे करने की इजाजत देता है ?, या फिर वें महज चुनावी जुमले बन कर रह जाएंगें ? और सत्ता पा गये दलों के नेता उन्हे इस या उस बहाने से एक तरफ सरका देगें ? अगर ऐसा होता है तो शायद भारत के लोकतंत्र और आम वोटर के साथ यह एक और बड़ा धोखा होगा । ''
लिखने को इस बार के चुनाव पर भी काफी कुछ लिखा जा सकता है पर , इन चुनावों में अनाप शनाप कहने में , आरोप प्रत्यारोपों में , प्रचार के तरीकों व भाषाई स्तर पर कितनी गंदगी फैली , स्तर किस हद तक गिरा और शालीनता कितनी लहूलूहान हुई , सभ्यता कितनी बार विधवा हुई इस पर ज्यादा लिखने की जरुरत ही नहीं है देश सब देख चुका है और इसे छोटी बात मत मानिए और इस पर चुप भी नहीं बैठना चाहिए क्योंकि आप की चुप्पी से भविष्य में सत्ता की ललक और हनक इस स्तर को ओर भी नीचे ले जा सकती है ।
अब मुद्दा यह है कि जीतने वालों ने जो वादे किये थे उनका क्या होगा , क्या वें पूरे होगें ? या वें पूरे हो भी सकते हैं ? क्या उनका कोई रोड़मैप अभी तक बना है ? कानून और संविधान उन्हे पूरे करने की इजाजत देता है ?, या फिर वें महज चुनावी जुमले बन कर रह जाएंगें ? और सत्ता पा गये दलों के नेता उन्हे खींसे निपोरते हुए इस या उस बहाने से एक तरफ सरका देगें ? अगर ऐसा होता है तो शायद भारत के लोकतंत्र और आम वोटर के साथ यह एक बड़ा धोखा होगा वैसा ही जैसा अक्सर उसके साथ होता आया है ।
मगर , क्या चुनाव आयोग ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर सकता है कि राजनैतिक दल चुनावों में वायदे करने से पहले उसे दिखाएं और वें उन वादों को कैसे व कब तक पूरा करेंगें , इसके लिए पैसा कहां से व कैसे आएगा इसका ब्यौरा भी रखें और चुनाव आयोग केवल उन्ही वादों को आमजन से करने की अनुमति दे जो वास्तविक हों , जिनके पैरों के नीचे ज़मीन हो , जिन्हे पूरा करने की व्यवस्था और संविधान में हो और इतना ही नहीं व्यवस्था यह भी हानी चाहिए कि ष्दि तय समय सीमा में वें वादें पूरे न किए जाएं तो वादे करने वालों के खिलाफ वैधानिक दंड व कार्यवाही की भी व्यवस्था हो । हालांकि इतना होने के बाद भी पूरी तरह आष्वस्त नहीं हुआ जा सकता है कि हमारे घाघ किस्म के नेता इससे बचने की तिकड़म नहीं निकाल लेंगें पर फिर भी इससे कम से कम चुनावों में झूठे वादे कर जीतने और बाद में उन्हे चुनावी जुमले या असंभव बताकर पल्टी मारने में कुछ तो कमी आएगी ही। ।
चलते - चलते एक और जरूरी ,और शायद सबसे ज्यादा जरूरी बात । चुनावों के बाद परिणाम आने से पहले यह एग्जिट पोल सर्वे अथवा पोस्ट पोल सर्वे क्यों होने चाहिएं ? इनसे देश का क्या भला होता है ? और यह क्यों जरूरी हैं ? अथवा इन के न होने से ऐसा क्या हो जाएगा जिससे देश या लोकतंत्र को हानि हो । सिवाय इसके कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनलस् दो-तीन दिन बिताने और अपनी - अपनी बात अपने - अपने दृष्टिकोण के साथ बताकर मोटी रकम कमाते हैं इसके अलावा इन सर्वेक्षणों का कोई महत्व समझ में नहीं आता ‌। उल्टे इन सर्वेक्षणों के चलते राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच कई बार तो गहरा वैमनस्य तक पैदा हो जाता है क्योंकि लोग इस बात से बेपरवाह होकर अपनी राय व्यक्त करते हैं कि इसका सामने वाले , समाज या देश पर क्या फर्क पड़ेगा। जिस प्रकार से चुनाव आयोग ने 2012 के बाद एग्जिट पोल सर्वेक्षणों पर रोक लगाई थी उसी प्रकार से पोस्ट पोल सर्वेक्षणों पर भी रोक लगनी चाहिए ताकि चुनाव परिणाम और मतदान के बीच के समय को शांति से गुजारा जा सके ।