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चिन्नप्प भारती के साहित्य में सामाजिक न्याय
November 30, 2018 • Sajag Bureau

--मुर्तजा खोदजायेवा एम.एम्, वरिष्ठ शिक्षक, टीएसआईओएस, ताशकंद, उज्बेकिस्तान

तमिल साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर चिन्नप्प भारती, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती और पुदुमैपित्तन द्वारा प्रवर्तित यथार्थवादी युग के सशक्त प्रतिनिधि हैं|  कविता, कहानी और लेखों की रचना करते हुए अपनी साहित्यिक यात्रा प्रारम्भ करने वाले चिन्नप्प भारती बीसवी सदी के अष्टम दशक में अपनी सृजनात्मकता के चरमोत्कर्ष पर पहुँचे जब उनके तीन सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘दाहम’, ‘संगम’ और ‘शक्कर ’ एक के बाद एक द्रुत गति से प्रकाशित हुए| इन तीनों में भारती ने समाज के तीन शोषित वर्गों की समस्याओं को केंद्र में रखा है| ‘दाहम’ में खेतीहर मजदूरों और किसानों पर ज़मींदारों के अत्याचार का दारुण चित्रण है; संगम में पहाडी इलाकों पर बसे गिरिवर्ग के भोले भाले लोग व्यापारियों और बिचौलियों द्वारा किस तरह ठगे जाते हैं, इसका वर्णन है| ‘शक्कर’ उपन्यास में चीनी मिल के मजदूरों के शोषण का विवरण है| चिन्नप्प भरती की विशेषता यह भी है कि वे समस्याओं को उछालकर चुप नहीं बैठते, बल्कि अपने उपन्यासों में ही उसका समाधान सुझाते हैं| वह समाधान कहीं बाहर से नहीं, बल्कि उसी समाज के अंदर से प्रकट होता है, अर्थात उन्हीं में से कोई युवक उठ खडा होता है और लोगों को संगठित करता है, उनमें जागरण पैदा करता है और सभी मिलकर संघर्ष करते हुए शोषण से मुक्ति पाते हैं|
सृजनात्मकता की मौलिकता इसी में है कि कोई भी लेखक अपनी कृति को यथार्थ पर आधारित करे और यथार्थवादी साहित्यकार की कसौटी यही है कि उसने अपनी आँखों से जो कुछ देखा है उसी को अपनी कृति का विषय बनाए| वह वास्तविक दुनिया से अपने कथानायकों और अन्य पात्रों को चुने| चिन्नप्प भारती इसी उसूल के कायल हैं| भारत में उनकी तुलना हिन्दी के प्रगतिवादी कवि यशपाल से की जा सकती है| दोनों की रचनाओं में हम बड़ी मात्रा में समानता और सामंजस्य पा सकते हैं| दोनों शीर्षस्थ कलाकार इस तथ्य पर पूरी तरह से सहमत हैं, ‘यदि कोई समाज व्यवस्थित है, यदि उस समाज में जातिभेद और बेगारी का अभाव हो तो नीति-न्याय पर अधिष्ठित समाज का निर्माण किया जा सकता है|” यही नहीं, दोनों ही साहित्यकार इस आशय के पोषक हैं कि प्रत्येक मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है अर्थात सूझबूझ और प्रयत्न से आदमी अपनी किस्मत को बदल सकता है| दोनों के बीच में अंतर यही कि जहाँ चिन्नप्प भारती अपने विद्यार्थी जीवन से ही पार्टी से जुड़कर काम कारते हुए सदस्य बन गए जिसके फलस्वरूप आगे चलकर वे पार्टी के अनेक प्रमुख पदों पर कार्य कर सके थे, वहां यशपाल कभी भी पार्टी के सदस्य नहीं बने और बाहर रहकर काम करते रहे| उनकी कृतियों में क्रांति के स्वर के साथ समाज विरोधी तत्वों के प्रति आक्रोश बुलंदी पर हैं | दोनों साहित्यकारों के बीच आयु की दृष्टि से इकतीस वर्ष का अंतर है |


जहाँ तक भारती के उपन्यासों में चित्रित सामाजिक न्याय का सरोकार है, उनकी कामयाबी का राज़ यही है कि वे आम जनता के संकट, शोषण से  नकी मुक्ति, सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों के अलग अलग पहलुओं को अपने उपन्यासों में अनूठे कौशल के साथ उजागर करते हैं| 

उपन्यास ‘शक्कर” दो भागों में है -- पहले भाग में ज़मींदार और किसान करुवायन के परिवार के बीच का विवाद चर्चित है| अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का नतीजा यह होता है कि करुवायन के बेटे वींरन को गाँव से निकलना पड़ता है| दूसरे भाग में युवा वीरन के साहसिक अभियानों का वर्णन है| वीरन शहर के चीनी मिल का मजदूर बनता है और मालिकों के शोषण के खिलाफ आवाज़ ऊंची करते हुए वह मजदूर संगठन का युवा नेता बन जाता है| इस बीच में वह मजदूर नेता कंदसामी की बेटी से प्यार करता है | कहानी कई मोड़ लेती है और अंत में वीरन कंदसामी की बेटी से विवाह कर लेता है|


चिन्नप्प भारती के दूसरे उपन्यास ‘दाहम’ में ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्र मिलता है| एक ऐसा गाँव जो जहाँ के निवासी शहरी जीवन की सुविधाओं से अवगत न्बहीं हैं और जांव के ज़मींदार के खेतों में बेगारी करते हुए गुलामों का जीवन जीने को अभिशप्त हैं| इसमें भी एक किसान युवक दलित कन्या से प्रेम करने के कारण गाँव से निष्कासित होता है और वह समाजवादी नेताओं के संपर्क में आने के बाद गाँव लौटकर ज़मींदार के खिलाफ लोगों को संगठित करता है और अंत में गरीब जनता की जीत होती है| इस उपन्यास पर केरल के मुख्या मंत्री रहे ई.एम.एस. नाम्बूतिरिपाद का पुरस्कार मिला था|

तीसरा उपन्यास ‘संगम’ पहाड़ों पर बसे गिरिवर्ग के लोगों के जीवन पर आधारित है| नगरों के व्यापारी और उनके बिचौलिए आकर पहाडी उत्पादों को कम दामों पार खरीदकर काफी मुनाफा कमाते हैं जबकि इनका उत्पादन करनेवाले गिरिजन भूखों मरते हैं| अंत में गिरिजनों का संघ बनता है और वे अपने अधिकारों के लिए लड़कर कामयाब होते हैं|

चिन्नप्प भारती तमिल साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार हैं | उपन्यास विधा में उनका जो योगदान है, वह वह इस लिहाज़ से अतुलनीय है कि उनकी कृतियाँ सत्य और यथार्थ पर आधारित हैं और जन कल्याण पर केन्द्रित हैं| भारती की दूसरी विशेषता है उनकी निष्ठा और सतत परिश्रम| प्रत्येक उपन्या के लेखनं के पूर्व वे क्षेत्र का अध्ययन करते हैं और तीन तीन साल तक समस्या के सभी पहलुओं को समझने के बाद ही रचना करते हैं| वे अपने पात्रों के साथ काफी समय बिताते हैं और उनके सुख दुखों में भाग लेकार अनुभव पाते हैं| उन्होंने स्वयं जो देखा है और भोगा है उसी को लिखते हैं| उनके लेखन में कहीं भी अत्युक्ति या अतिशयोक्ति नहीं होती| वे कहते हैं, ‘कोई भी चीज़ अदृश्य से नहीं आती, सब कुछ जीवन से और अनुभव से आता है|”


भारती की रचनाओं में उपन्यास ‘पवालायी’ का खास महत्त्व है| श्रमिकों के जीवन में यात्रा करते हुए चिन्नप्प भरती ने इसमें ‘प्रेम’ के पक्ष को दृढ़ता से पकड़ा है| किन्तु यह कोई मामूली प्रेम-कहानी नहीं है| इसमें उन्होंने ज़मींदारी युग में महिलाओं की स्थिति का चित्रण किया है, जिसमें लड़कियों को प्रेम करने और अपने साथी चुनने का अधिकार नहीं था| कृषक कन्या पवालायी अपने प्रेमी से विवाह नहीं कर पाती | हालांकि उसका पति अच्छा है, वालायी का मन प्रेमी की याद में लगा रहता है| दस साल बाद जब गाँव में उसका प्रेमी सख्त बीमार पड़ जाता है, पवालायी पति को छोड़कर प्रेमी की सेवा करने पहुँच जाती है| पवालायी के इस कदम को उस युग में महान क्रांति ही मानन चाहिए| बाद में उसके पति के जीवन में तंकम्मा आती है,
लेकिन चूंकि वह निम्न जाति की औरत थी, समाज उनके विवाह को स्वीकार नहीं करता| 

इस उपन्यास में समाज की अनेक विडंबनाओं का चित्रण मिलता है जो कि अमानवीय कही जा सकती हैं| भरती ने इन विसंगतियों को साहस के साथ पेश किया है| कहानी-कथन की शैली भी मोहक है, किन्तु अंत में पात्रों का जीवन तीतर बितर हो जाता है|


विगत शताब्दी का उत्तरार्ध साहित्यकारों के लिए परीक्षा का समय था | अनेक लेखकों ने संकल्प लिया कि वे कला के लिए, साहित्य के लिए नहीं लिखेंगे बल्कि जनता के लिए, समाज के उन्नयन के लिए लिखेंगे| चिन्नप्प भारती इसी खेमे के प्रमुख लेखक थे| भारती ने खेतीहर मजदूरों, शक्कर और रूई के मिलों में पिसने वाले कामगारों और भोले भाले गिरिवर्ग के लोगों को केंद्र बनाकर लिखा और तब ;तक लिल्खते रहे जब तक के मजदूर वर्ग खुद संगठन
बनाकर अपने अधिकारों के लिए लड़ने में कामयाब नहीं हुए| इस सिलसिले में उनका उपन्यास ‘सुरंगम’ उल्लेखानीय है जिसमें वे कोयले की खानों में नारकीय जीवन बिताने वाले मजदूरों की पैरवी करते हैं|


इस संदर्भ में एक जायज़ सवाल उठता है| क्या एक उपन्यास लिखने के लिए लेखक को कथानायकों और पात्रों के बीच में जाकर रहना आवश्यक है? उनके जीवन का निरीक्षण करके भी लिखा जा सकता है| अनेक लेखक यही मार्ग अपनाते हैं| किन्तु यदि लेखक उनके बीच में रहकर उनकी वेदनाओं और यातनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव करने के बाद लिखे तो उस बयानगी में एक ऎसी संजीदगी आती है जो पाठकों के दिल को छूती है| पाठक महसूस करता है कि घटनाएं उसके आसपास ही घटित होती हैं, इस तरह पाठक के साथ रचना का साधारणीकरण हो जाता है| तब पाठक भी समस्या पार गंभीरता सेस विचार करता है और उसके निवारण के उपायों पर काम करने लग जाता है| इस तरह साहित्य समाज कल्याण का ज़रिया बन जाता है|


गरज यह है कि चिन्नप्प भारती तमिल साहित्य के अनूठे साहित्यकार हैं और उनकी कृतियाँ अन्य लेखको की कृतियों से एक अलग पहचान रखती हैं